शिकारी हमेशा अंधेरी गलियों में नहीं छिपते। कई बार वे संस्थानों के अंदर बैठे होते हैं।
शिकारी हमेशा अंधेरी गलियों में नहीं छिपते। कई बार वे संस्थानों के अंदर बैठे होते हैं।
हमें
बचपन से एक ही
बात सिखाई जाती है।
“सिस्टम
पर भरोसा करो।”
स्कूल
पर भरोसा करो।
पुजारियों पर भरोसा करो।
संस्थाओं पर भरोसा करो।
अधिकार रखने वालों पर
भरोसा करो, क्योंकि शायद
समाज मानता है कि कुर्सी
पर बैठते ही इंसान संत
बन जाता है।
और फिर हर कुछ
साल बाद जब कोई
बड़ा शोषण कांड सामने
आता है, तो वही
समाज हैरानी जताता है।
सच्चाई
यह है कि शिकारी
इसलिए बच जाते हैं
क्योंकि समाज लोगों को
सीमाएँ सिखाने से पहले आज्ञाकारिता
सिखाता है।
“बड़ों
का सम्मान करो।”
“शिक्षकों का सम्मान करो।”
“धार्मिक नेताओं का सम्मान करो।”
लेकिन
बहुत कम लोग यह
जोड़ते हैं:
“जब
तक वे अपने अधिकार
का दुरुपयोग न कर रहे
हों।”
प्राइवेसी
यानी निजता क्यों जरूरी है?
क्योंकि जानकारी ही ताकत है।
जिस
पल किसी को आपकी
निजी जिंदगी, आपके डर, आपके
रिश्ते, आपकी कमजोरियाँ या
आपकी भावनात्मक स्थिति की जानकारी मिल
जाती है, उसी पल
वह उसे आपके खिलाफ
हथियार की तरह इस्तेमाल
कर सकता है। मानसिक
रूप से, सामाजिक रूप
से, आर्थिक रूप से, और
कई बार शारीरिक रूप
से भी।
यह कोई कल्पना नहीं
है।
यह इतिहास है, जो अब
इंटरनेट और तेज़ गॉसिप
के साथ दोहराया जा
रहा है।
दुनिया
भर में धार्मिक संस्थाओं
पर भरोसे के दुरुपयोग के
आरोप लगते रहे हैं।
कैथोलिक चर्च से जुड़े
मामलों में अरबों डॉलर
के समझौते हुए। भारत में
भी कई बार शोषण
को “परंपरा”, “संस्कृति” और “नैतिकता” के
पर्दे के पीछे छिपाया
गया। शायद क्योंकि कोई
गलत चीज़ अगर लंबे
समय तक चलती रहे,
तो समाज उसे परंपरा
कहना शुरू कर देता
है।
अब यही समस्या स्कूलों
और यूनिवर्सिटियों में देखिए।
कोई
शिक्षक, मेंटर, प्रशासक या अधिकार रखने
वाला व्यक्ति अगर किसी छात्र
की निजी जानकारी तक
पहुँच बना लेता है,
तो उसके पास सिर्फ
शैक्षणिक शक्ति नहीं रहती। उसके
पास सामाजिक और मानसिक नियंत्रण
की ताकत आ जाती
है।
डराने
की ताकत।
शर्मिंदा करने की ताकत।
अलग-थलग करने की
ताकत।
चुप कराने की ताकत।
और सबसे डरावनी बात?
ज्यादातर
शिकारी डरावने नहीं दिखते।
वे सम्मानित दिखते हैं।
यही
उनका सबसे बड़ा हथियार
होता है।
संस्थाएँ
अक्सर लोगों से पहले अपनी
छवि बचाती हैं। कभी-कभी
लोगों की बारी तो
फंडिंग, राजनीति, ब्रांडिंग और “संस्कारों” पर
भाषणों के बाद आती
है।
इसलिए
इन चीज़ों को सही नाम
देना जरूरी है।
किसी
की निजी जानकारी चुराकर
सामाजिक दबाव बनाना शोषण
है।
प्राइवेट चैट का इस्तेमाल
डराने के लिए करना
शोषण है।
इज्जत खराब करने की
धमकी देकर नियंत्रण करना
शोषण है।
बालिग लोगों के रिश्तों पर
निगरानी रखना शोषण है।
धर्म, संस्कृति या नैतिकता का
इस्तेमाल डराने के हथियार की
तरह करना शोषण है।
यह अनुशासन नहीं है।
यह “चिंता” नहीं है।
यह परंपरा नहीं है।
यह शोषण है।
इसीलिए
निजता से जुड़े कानून
बनाए गए। इसलिए नहीं
कि सरकारें अचानक इंसानियत से भर गईं,
बल्कि इसलिए क्योंकि समाज ने समझा
कि बिना नियंत्रण के
निजी जानकारी आखिरकार अत्याचार का हथियार बन
जाती है।
हर बालिग व्यक्ति को यह अधिकार
है कि वह किससे
बात करे, किससे दोस्ती
रखे, किसे ब्लॉक करे
और किससे दूरी बनाए।
यह सामान्य मानवीय व्यवहार है।
लेकिन
नैतिकता के नाम पर
निगरानी रखना सामान्य नहीं
है।
अगर
दो बालिग लोग अपनी सहमति
से बातचीत कर रहे हैं
और कोई तीसरा व्यक्ति
उनकी निजी जानकारी चुराकर
उसे शर्मिंदा करने, ब्लैकमेल करने या सामाजिक
दबाव बनाने के लिए इस्तेमाल
करता है, तो वह
“संस्कृति बचाना” नहीं है। वह
सीधा मानसिक और सामाजिक उत्पीड़न
है।
और दुख की बात
यह है कि हमारे
समाज में प्राइवेसी को
आज भी शक की
नजर से देखा जाता
है।
भारत
में लोग अक्सर दूसरों
की जिंदगी में दखल देना
अपना अधिकार समझते हैं। रिश्तेदार फोन
चेक करते हैं। समाज
रिश्तों की निगरानी करता
है। संस्थाएँ छात्रों की निजी बातें
फैलाती हैं। लोग दूसरों
की बातचीत ऐसे सुनते हैं
जैसे किसी गुप्त एजेंसी
में नौकरी मिली हो।
फिर
वही समाज पूछता है
कि लोग तनाव और
डर में क्यों जी
रहे हैं।
असलियत
बहुत सरल है:
शिकारी
डर पर चलते हैं।
बदनामी
का डर।
गॉसिप का डर।
“लोग क्या कहेंगे” का
डर।
सच कहें तो “लोग
क्या कहेंगे” ने शायद जितने
शोषकों को बचाया है,
उतना किसी सुरक्षा ताले
ने भी नहीं बचाया
होगा।
इसलिए
लोगों को डरना बंद
करना होगा।
सबूत
संभालिए।
रिकॉर्ड रखिए।
अपने कानूनी अधिकार जानिए।
घबराइए मत।
खुद को अकेला मत
कीजिए।
भरोसेमंद लोगों से बात कीजिए।
शुरुआत में ही गलत
व्यवहार को पहचानिए और
आवाज उठाइए।
और सबसे जरूरी बात:
अधिकार
रखने वालों को भगवान मानना
बंद कीजिए।
किसी
का पद उसे नैतिक
नहीं बना देता।
धार्मिक कपड़े किसी को पवित्र
नहीं बना देते।
यूनिवर्सिटी का आईडी कार्ड
चरित्र प्रमाण पत्र नहीं होता।
कुछ
शिकारी सूट पहनते हैं।
कुछ धार्मिक वस्त्र पहनते हैं।
और कुछ हाथ में
अटेंडेंस रजिस्टर लेकर चलते हैं।
एक आज़ाद समाज वह नहीं
है जहाँ हर कोई
हर किसी की जासूसी
करे।
एक आज़ाद समाज वह है
जहाँ लोग बिना डर
के जी सकें। जहाँ
उनकी निजी जानकारी को
उनके खिलाफ हथियार न बनाया जाए।
प्राइवेसी
कोई अपराध नहीं है।
प्राइवेसी सुरक्षा है।
सीमाएँ तय करना बदतमीजी
नहीं है।
और बिना जवाबदेही वाली
संस्थाएँ अक्सर शिकारगाह बन जाती हैं।
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