स्वच्छ भारत: क्या भारत वास्तव में स्वच्छ बन सकता है?
स्वच्छ भारत: क्या भारत वास्तव में स्वच्छ बन सकता है?
जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत की, तब करोड़ों भारतीयों ने इस अभियान का स्वागत किया। नारा सरल था, भावनात्मक था और सुनने में प्रेरणादायक भी एक स्वच्छ भारत। लेकिन देश के विभिन्न हिस्सों को देखने और लोगों के व्यवहार को समझने के बाद मैं एक असहज निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ।
क्या भारत वास्तव में स्वच्छ बन सकता है? मेरा उत्तर है नहीं। कम-से-कम तब तक नहीं, जब तक भारतीय अपनी मानसिकता नहीं बदलते। कोई भी देश केवल सरकारी योजनाओं, विज्ञापनों या नारों से साफ नहीं बनता। एक राष्ट्र तभी स्वच्छ बनता है जब उसके नागरिक स्वयं यह जिम्मेदारी स्वीकार करें कि सार्वजनिक स्थान भी उतने ही उनके हैं, जितना उनका अपना घर।
दुर्भाग्य से भारत की सबसे बड़ी समस्या यही है।
मैं केवल गरीबों या अशिक्षित लोगों की बात नहीं कर रहा। मैं उन पढ़े-लिखे, आर्थिक रूप से सम्पन्न लोगों की बात कर रहा हूँ जो बिना किसी झिझक के सड़कों, पार्कों, बाजारों और सार्वजनिक स्थानों पर प्लास्टिक की बोतलें, खाने के रैपर, कागज़ और अन्य कचरा फेंक देते हैं। जब तक कचरा उनके अपने घर के भीतर नहीं है, तब तक उन्हें उसमें कोई समस्या दिखाई नहीं देती।
यही सोच स्वच्छ भारत की सबसे बड़ी दुश्मन है। दो दिन पहले मैं चंडीगढ़ के सबसे सुंदर और सबसे अधिक घूमे जाने वाले स्थानों में से एक सुखना लेक गया।
हर सुबह हजारों लोग वहाँ सैर करने आते हैं। कुछ योग करते हैं, कुछ खुली हवा में साँस लेकर अपने दिन की शुरुआत करते हैं, तो कुछ केवल मानसिक शांति पाने के लिए वहाँ पहुँचते हैं। ऐसी जगह देश की सबसे स्वच्छ जगहों में होनी चाहिए। लेकिन जैसे ही मैं झील के किनारे बने रास्ते पर आगे बढ़ा, वहाँ जगह-जगह प्लास्टिक की पानी की बोतलें, खाने के पैकेट, कागज़ और अन्य कचरा बिखरा हुआ दिखाई दिया।
सबसे दुखद बात यह थी कि वहाँ जगह-जगह कूड़ेदान लगाए गए हैं। अधिकांश कचरा आसानी से उन्हीं डस्टबिन में डाला जा सकता था, जिनमें से बहुत-सा पुनर्चक्रण (रीसाइक्लिंग) भी किया जा सकता था। फिर भी कॉलेज के छात्र हों या आर्थिक रूप से सम्पन्न वयस्क बहुत से लोगों ने कुछ कदम चलकर कूड़ेदान तक जाने की भी आवश्यकता नहीं समझी।
यदि लोग इतना छोटा-सा नागरिक कर्तव्य निभाने को तैयार नहीं हैं, तो कोई भी सरकारी अभियान सफल कैसे होगा? दुर्भाग्य से यह कहानी केवल चंडीगढ़ की नहीं है। भारत के लगभग हर शहर में सड़कों के किनारे कूड़े के ढेर, गंदे बाजार, प्रदूषित नदियाँ, बदबू मारते सार्वजनिक शौचालय और उपेक्षित पार्क आम दृश्य बन चुके हैं। ऐसा लगता है जैसे सार्वजनिक स्वच्छता किसी की जिम्मेदारी ही नहीं है। यदि आपको मेरी बात पर विश्वास नहीं है, तो किसी सरकारी कार्यालय के सार्वजनिक शौचालय का उपयोग करके देख लीजिए।
आपको समझ में आ जाएगा कि मैं किस भारत की बात कर रहा हूँ। जब भी इस विषय पर चर्चा होती है, सबसे सामान्य उत्तर मिलता है "भारत की आबादी बहुत ज्यादा है।" लेकिन समस्या आबादी नहीं है। दुनिया में ऐसे अनेक देश हैं जिनकी आबादी भी बहुत बड़ी है, फिर भी उनके शहर साफ-सुथरे हैं। क्यों?
क्योंकि वहाँ लोग यह समझते हैं कि सड़कें, पार्क और सार्वजनिक स्थान भी उनकी ही संपत्ति हैं। भारत की समस्या केवल अधूरी व्यवस्था नहीं है।
समस्या नागरिक अनुशासन की भी है। आज भी सार्वजनिक स्थानों पर कचरा फेंकने वालों के विरुद्ध शायद ही कहीं प्रभावी कार्रवाई होती हो। जहाँ कूड़ेदान हैं, वे या तो बहुत छोटे हैं, या पहले से भरे हुए मिलते हैं, क्योंकि जो थोड़े-बहुत जिम्मेदार लोग हैं, वही उनका उपयोग करते हैं। निश्चित रूप से बेहतर आधारभूत संरचना की आवश्यकता है। लेकिन केवल डस्टबिन बढ़ा देने से भारत स्वच्छ नहीं होगा। जब तक लोगों की सोच नहीं बदलेगी, तब तक सबसे अच्छी व्यवस्था भी असफल हो जाएगी।
इसीलिए मुझे गंभीर संदेह है कि स्वच्छ भारत अभियान अपने घोषित उद्देश्य को पूरी तरह प्राप्त कर पाएगा।
अभियान जागरूकता पैदा कर सकता है। लेकिन वह नागरिक जिम्मेदारी की जगह नहीं ले सकता।
दुर्भाग्य से सरकारों के लिए नारे बनाना आसान होता है, लोगों की सोच बदलना नहीं। और कई बार ऐसा भी प्रतीत होता है कि ऐसे अभियानों के नाम पर जनता का भारी धन खर्च किया जाता है, जबकि परिणाम जमीन पर दिखाई नहीं देते।
उदाहरण के लिए गंगा सफाई अभियान को ही देख लीजिए। दशकों में गंगा की सफाई के नाम पर लगभग 35,000 करोड़ रुपये खर्च किए गए। लेकिन आज भी गंगा के अनेक हिस्से उतने ही प्रदूषित हैं जितने पहले थे। तो सवाल उठना स्वाभाविक है
पैसा गया कहाँ? जनता का हर रुपया जवाबदेही मांगता है। लेकिन इस कहानी का दूसरा पक्ष भी है। जब नागरिक गंदी सड़कें, प्रदूषित नदियाँ, कूड़े से भरे पार्क, बदबूदार सार्वजनिक शौचालय और हर जगह फैली गंदगी को अपनी समस्या ही नहीं मानते, तब वे स्वयं सरकारों को यह संदेश देते हैं कि स्वच्छता कोई राजनीतिक प्राथमिकता नहीं है।
सच्चाई यह है कि स्वच्छ भारत केवल सरकार नहीं बना सकती।
विज्ञापन नहीं बना सकते। झाड़ू लेकर फोटो खिंचवाने वाले नेता नहीं बना सकते।
स्वच्छ भारत केवल भारतीय नागरिक बना सकते हैं। जिस दिन भारत का हर नागरिक अपने घर के बाहर की सड़क को भी अपना घर समझने लगेगा, उसी दिन स्वच्छ भारत एक चुनावी नारा नहीं रहेगा वह भारत की पहचान बन जाएगा।
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