अगर ये छात्र आतंकवादी हैं, तो लोकतंत्र में क्या बचा है?
अगर
ये छात्र आतंकवादी हैं, तो लोकतंत्र में क्या बचा है?
पिछले कुछ दिनों में भारत ने
जंतर-मंतर पर एक चिंताजनक दृश्य देखा है।
युवा छात्र, जिनमें से कई का
कहना है कि उन्होंने वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं और सरकारी नौकरियों की तैयारी की
है, परीक्षा घोटालों, पेपर लीक और भारत की शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही के लगातार
होते पतन के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करने के लिए एकत्र हुए हैं। अभिजीत दिपके के नेतृत्व
में चल रही कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने ऑनलाइन व्यंग्य के रूप में शुरू हुई पहल को
एक राष्ट्रव्यापी युवा आंदोलन में बदल दिया है, जो सत्ता में बैठे लोगों से जवाब मांग
रहा है। विरोध स्थल से आई रिपोर्टों के अनुसार छात्र आपस में चर्चा कर रहे हैं, एक
छोटी लाइब्रेरी बना रहे हैं, किताबें बांट रहे हैं और शांतिपूर्ण तरीके से जवाबदेही
की मांग कर रहे हैं।
लेकिन इन सवालों का जवाब देने
के बजाय, ऐसा प्रतीत होता है कि ध्यान अब प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करने, सीमित
करने और बदनाम करने पर केंद्रित हो गया है।
जंतर-मंतर से सामने आई सबसे
चिंताजनक घटनाओं में से एक वह थी, जिसमें प्रदर्शनकारियों के लिए पानी और भोजन लेकर
आने वाले लोगों से आधार कार्ड की जांच किए जाने की खबरें सामने आईं। जब इस पर सवाल
उठाए गए तो दिल्ली पुलिस के अधिकारियों ने पहले इन खबरों से इनकार किया। लेकिन वीडियो
सामने आने के बाद यह मुद्दा सार्वजनिक बहस का विषय बन गया और अंततः आश्वासन दिया गया
कि ऐसी घटनाएं दोबारा नहीं होंगी।
इसी दौरान अभिजीत दिपके का
एक सवाल बहुत से लोगों के मन में घर कर गया:
"क्या जंतर-मंतर आने के
लिए लोगों को वीज़ा चाहिए?"
यह एक बिल्कुल उचित सवाल है।
जंतर-मंतर कोई सैन्य ठिकाना
नहीं है।
यह कोई प्रतिबंधित सुरक्षा
क्षेत्र नहीं है।
यह राष्ट्रीय राजधानी के उन
चुनिंदा स्थानों में से एक है जहाँ नागरिक अपने लोकतांत्रिक अधिकार के तहत शांतिपूर्ण
विरोध प्रदर्शन कर सकते हैं।
यदि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों
को केवल पानी पहुंचाने के लिए भी लोगों की पहचान जांची जा रही है, तो मामला अब केवल
कानून और व्यवस्था का नहीं रह जाता। यह लोकतांत्रिक असहमति के लिए उपलब्ध होते जा रहे
सीमित स्थान का प्रश्न बन जाता है।
इससे भी अधिक चिंताजनक वे रिपोर्टें
और वीडियो हैं जो सोशल मीडिया और समाचार माध्यमों में सामने आए हैं, जिनमें प्रदर्शनकारियों
के साथ झड़पों और कथित हमलों के दृश्य दिखाई देते हैं। अनेक प्रतिभागियों और पर्यवेक्षकों
ने आरोप लगाया है कि सत्ताधारी दल के समर्थकों ने छात्रों को डराने-धमकाने की कोशिश
की।
भले ही हर आरोप अदालत में सिद्ध
हो या न हो, लेकिन बड़ा सवाल अभी भी अनुत्तरित है:
शिक्षा व्यवस्था की विफलताओं
के खिलाफ आवाज उठाने वाले छात्रों को आखिर शारीरिक हमलों और झड़पों का सामना क्यों
करना पड़ रहा है?
यदि राज्य जंतर-मंतर के आसपास
भारी पुलिस बल, ड्रोन, कैमरे, बैरिकेड और निगरानी व्यवस्था तैनात कर सकता है, तो क्या
वह यह सुनिश्चित नहीं कर सकता कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को हिंसा और डराने-धमकाने
से सुरक्षा मिले?
लेकिन शायद सबसे चौंकाने वाला
घटनाक्रम राजनीतिक प्रतिक्रिया के रूप में सामने आया।
समाचार रिपोर्टों और व्यापक
रूप से प्रसारित वीडियो क्लिप्स के अनुसार, केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान
ने इस आंदोलन के संदर्भ में ऐसी भाषा का प्रयोग किया जिसे प्रदर्शनकारियों ने आतंकवाद
से जोड़कर देखा।
छात्रों की प्रतिक्रिया तत्काल
और भावनात्मक थी।
उन्होंने एक सीधा सवाल पूछा:
जब छात्र पेपर लीक, बेरोजगारी
और शिक्षा व्यवस्था में भ्रष्टाचार के लिए जवाबदेही मांगते हैं, तो वे आतंकवादी कैसे
बन जाते हैं?
यहीं पर सरकार शायद एक गंभीर
राजनीतिक गलती कर रही है।
सरकारें आमतौर पर जंतर-मंतर
पर बैठे कुछ सौ छात्रों से नहीं डरतीं।
सरकारें उस संभावना से डरती
हैं कि वे कुछ सौ छात्र वास्तव में उन लाखों युवा भारतीयों का प्रतिनिधित्व कर रहे
हों, जो स्वयं को उपेक्षित और अनसुना महसूस करते हैं।
बिहार का छात्र पेपर लीक को
समझता है।
उत्तर प्रदेश का छात्र भर्ती
प्रक्रियाओं में होने वाली देरी को समझता है।
कर्नाटक का छात्र बेरोजगारी
को समझता है।
पंजाब का छात्र शिक्षा और अवसरों
के बीच बढ़ती खाई को समझता है।
यह आंदोलन राजनीतिक व्यवस्था
के लिए इसलिए खतरनाक नहीं है क्योंकि यह हिंसक है।
यह इसलिए खतरनाक है क्योंकि
यह उन मुद्दों की भाषा बोलता है जिन्हें भारत के करोड़ों युवा समझते हैं।
वर्षों से भारत की राजनीति
धर्म, जाति, क्षेत्र और पहचान के इर्द-गिर्द घूमती रही है।
लेकिन CJP ने बहस को उन विषयों
की ओर मोड़ दिया है जिन्हें संभालना राजनीतिक दलों के लिए कहीं अधिक कठिन है:
रोजगार, परीक्षाएँ, भ्रष्टाचार
और जवाबदेही।
ये ऐसे मुद्दे नहीं हैं जो
युवाओं को बाँटते हैं।
ये ऐसे मुद्दे हैं जो युवाओं
को एकजुट करते हैं।
इसीलिए ये प्रदर्शन महत्वपूर्ण
हैं।
इसीलिए उनका मजाक उड़ाने की
हर कोशिश महत्वपूर्ण है।
इसीलिए उन्हें डराने-धमकाने
की हर कोशिश महत्वपूर्ण है।
और यही कारण है कि हर भारतीय
चाहे वह भाजपा का समर्थक हो, कांग्रेस का, आम आदमी पार्टी का, वामपंथ का, या किसी भी
राजनीतिक दल का समर्थक न हो उसे चिंतित होना चाहिए जब शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को
नागरिकों की बजाय दुश्मनों की तरह देखा जाने लगे।
लोकतंत्र सरकार की आलोचना होने
से नहीं मरता।
लोकतंत्र तब मरता है जब सरकारें
आलोचना को ही खतरे के रूप में देखने लगती हैं।
यदि सवाल पूछने वाले छात्र
"आतंकवादी" बन जाते हैं, तो भारत केवल पेपर लीक की समस्या का सामना नहीं
कर रहा है।
भारत स्वयं लोकतांत्रिक जवाबदेही
के संकट का सामना कर रहा है।
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