सम्मान/ईश्वर की इच्छा: हारे हुए तर्क का अंतिम सहारा
सम्मान/ईश्वर
की इच्छा: हारे हुए तर्क का अंतिम सहारा
सम्मान किसी भी भाषा का सबसे
सुंदर शब्दों में से एक है। लेकिन सम्मान ईमानदारी, बुद्धिमत्ता, सत्यनिष्ठा और चरित्र
से अर्जित किया जाता है असहज प्रश्नों से बचने के लिए ढाल की तरह इस्तेमाल नहीं किया
जाता। हाल ही में मुझे कहा गया कि राम मंदिर विवाद से जुड़े गंभीर प्रश्नों को केवल
इसलिए नज़रअंदाज़ कर दूँ क्योंकि कुछ लोगों की राजनीतिक सोच अलग है और उनका सम्मान
किया जाना चाहिए। तब मेरे मन में यह प्रश्न उठा कि क्या "सम्मान" शब्द धीरे-धीरे
हर उस व्यक्ति का सहारा बनता जा रहा है जिसके पास तर्क समाप्त हो जाते हैं।
वर्षों तक भाजपा ने भगवान राम
को अपने सबसे शक्तिशाली भावनात्मक प्रतीकों में से एक के रूप में प्रस्तुत किया। करोड़ों
हिंदुओं से राम मंदिर निर्माण के नाम पर एकजुट होने की अपील की गई। लोगों ने अपनी आस्था
के साथ धन, सोना, चाँदी, आभूषण और अन्य भेंटें अर्पित कीं क्योंकि उन्हें विश्वास था
कि वे एक पवित्र कार्य में योगदान दे रहे हैं। आज उन्हीं दानों के प्रबंधन को लेकर
आरोप, पुलिस जांच और विपक्ष की प्रेस कॉन्फ्रेंसें चर्चा का विषय बनी हुई हैं। लेकिन
पूरी पारदर्शिता की मांग करने के बजाय बहुत से लोग यह समझाने में लग जाते हैं कि प्रश्न
पूछे ही क्यों जा रहे हैं। कोई कहता है कि थोड़ा इंतज़ार करो, कोई हर आरोप को प्रोपेगेंडा
बता देता है, तो कोई जांच पूरी होने से पहले ही राजनीतिक नेताओं के बचाव में उतर आता
है। देखते ही देखते चर्चा जवाबदेही से हटकर प्रतिष्ठा बचाने की कवायद बन जाती है।
कुछ ऐसा ही हमने NEET पेपर
लीक के बाद भी देखा। हजारों विद्यार्थियों की वर्षों की मेहनत दांव पर लग गई और कई
परिवारों ने अपने बच्चों को आत्महत्या के कारण खो दिया। लेकिन संस्थागत विफलताओं पर
प्रश्न उठाने के बजाय कई लोगों ने यह कहकर बात समाप्त कर दी कि "यह सब भगवान की
इच्छा थी।"
मैं आज तक इस सोच को समझ नहीं
पाया।
यदि गलती इंसान करता है, यदि
भ्रष्टाचार इंसान करता है, यदि लापरवाही इंसान करता है और यदि अपराध इंसान करता है,
तो उसकी जिम्मेदारी भी इंसान की होनी चाहिए भगवान की नहीं। भगवान की अवधारणा इसलिए
नहीं बनाई गई थी कि लोग अपनी गलतियाँ, अपनी असफलताएँ और अपने अपराध उसके सिर पर डालकर
स्वयं जिम्मेदारी से मुक्त हो जाएँ। आस्था का उद्देश्य ईमानदारी, करुणा, न्याय और नैतिक
साहस पैदा करना था, न कि कठिन प्रश्नों से बचने या दोषियों को बचाने का माध्यम बनना।
जब भी किसी मानवीय त्रासदी
के बाद हम कह देते हैं कि "भगवान की यही इच्छा थी," तब हम अनजाने में उन
प्रश्नों को पूछना ही बंद कर देते हैं जो वास्तव में पूछे जाने चाहिए। जिम्मेदार कौन
था? गलती कहाँ हुई? क्या इसे रोका जा सकता था? भविष्य में इसे रोकने के लिए हमें क्या
करना चाहिए? जिस समाज में हर मानवीय विफलता को ईश्वरीय इच्छा कहकर टाल दिया जाता है,
वहाँ धीरे-धीरे मानव संस्थाओं से जवाबदेही की मांग समाप्त हो जाती है। और जहाँ जवाबदेही
समाप्त होती है, वहाँ भ्रष्टाचार, लापरवाही और अन्याय बिना किसी रोक-टोक के बढ़ने लगते
हैं।
विडंबना यह है कि लगभग हर धर्म
हमें सिखाता है कि ईश्वर हर जगह है, हर व्यक्ति में है और सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त
है। फिर भी राजनीति लोगों की भावनाओं को प्रतीकों, स्मारकों और व्यक्तियों से जोड़ने
का प्रयास करती है, क्योंकि भावनाएँ राजनीति की सबसे बड़ी पूँजी होती हैं। हर राजनीतिक
दल इस मनोविज्ञान को समझता है। इसलिए जब आस्था राजनीतिक शक्ति से जुड़ जाती है, तब
जवाबदेही की आवश्यकता कम नहीं बल्कि और अधिक बढ़ जाती है।
मुझे इस बात से निराशा नहीं
होती कि लोग मेरी बात से असहमत हैं। स्वस्थ असहमति लोकतंत्र की आत्मा है। निराशा तब
होती है जब लोग प्रश्नों का उत्तर देने के बजाय प्रश्न पूछने वाले पर ही "असम्मान"
का आरोप लगा देते हैं। असहमति असम्मान नहीं है। प्रश्न पूछना असम्मान नहीं है। प्रमाण
माँगना असम्मान नहीं है। यदि किसी को लगता है कि मेरे तर्क गलत हैं, तो मैं उसका स्वागत
करता हूँ। बेहतर तथ्य प्रस्तुत कीजिए। मेरे तर्कों को चुनौती दीजिए। यही सार्वजनिक
विमर्श का सही तरीका है।
लेकिन ऐसा कभी नहीं होना चाहिए
कि प्रमाणों की जगह भावनात्मक अपीलें ले लें जैसे, "बड़ों का सम्मान करो,"
या "रिश्तों का सम्मान करो।" सम्मान आलोचना से छूट का प्रमाणपत्र नहीं है।
न उम्र किसी को प्रश्नों से ऊपर रखती है और न ही पारिवारिक संबंध। जिस क्षण दो लोग
भ्रष्टाचार, शासन, अर्थव्यवस्था या सार्वजनिक नीति पर चर्चा करने बैठते हैं, उस क्षण
बहस उम्र या रिश्तों की नहीं रहती; वह विचारों की बहस बन जाती है। और विचारों का मूल्य
उनकी उम्र से नहीं, बल्कि उनके तर्क और प्रमाण से तय होना चाहिए।
हाल ही में हिमाचल प्रदेश में
एक पारिवारिक कार्यक्रम के दौरान मुझे इसका अनुभव फिर हुआ। वहाँ कई लोगों ने प्रधानमंत्री
नरेंद्र मोदी के प्रति अपना अटूट समर्थन व्यक्त किया और उनके विरुद्ध एक भी आलोचनात्मक
बात सुनना नहीं चाहा। लेकिन जब मैंने विनम्रता से भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, महँगाई, शासन
और सार्वजनिक नीतियों पर प्रश्न पूछे, तो सार्थक उत्तर बहुत कम मिले। चर्चा तथ्यों
से हटकर व्यक्तियों के बचाव पर आ गई। मेरी दृष्टि में अंधी राजनीतिक निष्ठा का यही
परिणाम होता है धीरे-धीरे वह विवेक की जगह भावनात्मक लगाव को स्थापित कर देती है।
भारत की अपनी वर्तमान यात्रा
के दौरान मैंने विभिन्न राज्यों और विभिन्न पृष्ठभूमि के लोगों से बातचीत की है। लगभग
हर जगह लोगों में महँगाई, बेरोजगारी और सरकारी नीतियों को लेकर असंतोष दिखाई देता है।
केवल कुछ महीनों में मैंने स्वयं आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में उल्लेखनीय वृद्धि देखी
है। हर व्यक्ति एक ही राजनीतिक निष्कर्ष पर पहुँचे, यह आवश्यक नहीं है, लेकिन जनता
की बढ़ती निराशा स्पष्ट दिखाई देती है। शायद यही कारण है कि बड़ी संख्या में युवा अब
स्वयं संगठित होकर अपनी आवाज़ बुलंद करने लगे हैं।
मेरी भूमिका बहुत सरल है। मैं
लिखता हूँ। विभिन्न राजनीतिक दलों की प्रेस कॉन्फ्रेंस सुनता हूँ। सार्वजनिक रूप से
उपलब्ध तथ्यों का अध्ययन करता हूँ और फिर अपने निष्कर्ष प्रस्तुत करता हूँ। हो सकता
है मैं कभी गलत हो जाऊँ, और हो सकता है कई बार सही भी साबित हो जाऊँ। इसलिए मैं अपने
लेख खुले मंच पर प्रकाशित करता हूँ। यदि किसी को लगता है कि मेरे निष्कर्ष गलत हैं,
तो मैं उसका स्वागत करता हूँ। वह अपने तथ्यों और प्रमाणों के साथ अपना उत्तर लिखे,
अपने नाम से प्रकाशित करे, ताकि पाठकों को दोनों पक्ष पढ़ने और स्वयं निर्णय लेने का
अवसर मिल सके।
सम्मान का समाज में निश्चित
स्थान है। वह रिश्तों को मजबूत करता है, विनम्रता सिखाता है और हमें एक-दूसरे के साथ
गरिमा से पेश आना याद दिलाता है। लेकिन सम्मान को कभी भी चुप्पी का पर्याय नहीं बनाया
जाना चाहिए और न ही कठिन प्रश्नों को दबाने का हथियार। लोकतंत्र में सम्मान का अर्थ
असहमति से बचना नहीं, बल्कि ईमानदारी से उसका सामना करना है। विचारों की जांच होनी
चाहिए। तर्कों के साथ प्रमाण होने चाहिए। और सत्य की खोज कभी नहीं रुकनी चाहिए। यदि
सम्मान एक ईमानदार प्रश्न भी सहन नहीं कर सकता, तो संभव है कि वहाँ सम्मान नहीं, बल्कि
केवल एक हारे हुए तर्क को बचाने का प्रयास किया जा रहा हो।
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