संविधान से ऊपर कोई संगठन नहीं

 

संविधान से ऊपर कोई संगठन नहीं

English Version: https://rakeshinsightfulgaze.blogspot.com/2026/06/no-organization-is-above-constitution.html

हाल ही में कर्नाटक के गृह मंत्री और आरएसएस के बीच उत्पन्न विवाद ने एक ऐसा संवैधानिक प्रश्न सामने रखा है, जिस पर हर भारतीय को गंभीरता से विचार करना चाहिए। क्या कोई संगठन केवल इसलिए स्वयं को संविधान से ऊपर मान सकता है क्योंकि वह सौ वर्ष पुराना है?

हाल ही में मैंने फेसबुक पर एक वीडियो देखा, जिसमें कर्नाटक के एक आरएसएस प्रतिनिधि ने कथित रूप से कर्नाटक के गृह मंत्री द्वारा कानून के तहत मांगी गई जानकारी के संदर्भ में कहा कि गृह मंत्री "सिर्फ दो सप्ताह पुराने हैं", जबकि आरएसएस सौ वर्ष पुराना संगठन है। दुर्भाग्यवश, मैंने उस वीडियो का लिंक सुरक्षित नहीं किया और अब उसे दोबारा खोज रहा हूँ। लेकिन यदि यह बयान वास्तव में दिया गया है, तो यह गंभीर सार्वजनिक चर्चा का विषय है, क्योंकि यह भारत की संवैधानिक व्यवस्था की मूल भावना को ही चुनौती देता है।

गृह मंत्री के पद की गरिमा उस व्यक्ति की आयु या उसके कार्यकाल से निर्धारित नहीं होती। वह एक संवैधानिक पद है। चाहे कोई व्यक्ति उस पद पर दो सप्ताह से हो, दो वर्षों से हो या बीस वर्षों से इससे कोई अंतर नहीं पड़ता। उस पद को अधिकार किसी व्यक्ति ने नहीं दिए, बल्कि भारत के संविधान ने दिए हैं। कानून के अनुसार गृह मंत्री पर राज्य में कानून-व्यवस्था बनाए रखने, कानूनों को लागू कराने तथा आवश्यकता पड़ने पर संगठनों से जानकारी और जवाबदेही सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी होती है।

ऐसे संवैधानिक अधिकार का मज़ाक उड़ाते हुए किसी संगठन की आयु की तुलना गृह मंत्री के कार्यकाल से करना केवल असम्मान नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की मूल समझ का अभाव भी दर्शाता है।

संविधान किसी की वरिष्ठता वर्षों से तय नहीं करता। संविधान अधिकार केवल कानून से देता है। जैसा कि मैं अपने पिछले अनेक लेखों में लिख चुका हूँ, मेरा मानना है कि आरएसएस एक ऐसे सामाजिक ढांचे का प्रतिनिधित्व करता है जिसकी जड़ें उन ऐतिहासिक रूप से विशेषाधिकार प्राप्त वर्गों में रही हैं, जिन्होंने सदियों तक भारतीय समाज पर अपना प्रभुत्व बनाए रखा। मेरी दृष्टि में आज भी उसके कुछ प्रतिनिधियों के व्यवहार में वही मानसिकता दिखाई देती है मानो उन्हें भारत के संवैधानिक संस्थानों के प्रति जवाबदेह होने की आवश्यकता ही नहीं है।

ऐसा प्रतीत होता है कि वे स्वयं को संविधान से अधिक अपनी वैचारिक व्यवस्था के प्रति उत्तरदायी मानते हैं।

लेकिन भारत अब उस पुराने सामाजिक ढांचे के अनुसार नहीं चलता।

भारत का शासन संविधान से चलता है, वर्ण व्यवस्था से नहीं।

इस देश में प्रत्येक नागरिक और प्रत्येक संगठन कानून के समक्ष समान है।

कोई भी संगठन चाहे वह कितना भी पुराना, प्रभावशाली, लोकप्रिय या राजनीतिक रूप से शक्तिशाली क्यों न हो कानूनी जवाबदेही से मुक्त नहीं हो सकता।

भारत ने पिछले कई दशकों में आतंकवादी घटनाओं और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी गंभीर चुनौतियों का सामना किया है। इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए संसद ने अनेक कानून बनाए और उन्हें और अधिक कठोर किया, ताकि संगठनों का पंजीकरण, उनकी वित्तीय पारदर्शिता, उनके धन के स्रोत तथा उनकी गतिविधियों की आवश्यकतानुसार जांच सुनिश्चित की जा सके।

ये कानून किसी एक संगठन के लिए नहीं बनाए गए। ये सभी पर समान रूप से लागू होने के लिए बनाए गए हैं। यदि संसद ने ऐसे कानून बनाए हैं, तो उनका पालन भी सभी को करना होगा।

यहीं पर मेरा मानना है कि पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकारें भी अपनी जिम्मेदारी पूरी तरह निभाने में असफल रहीं। उनके पास अवसर था कि वे इन कानूनों को आरएसएस सहित सभी संगठनों पर समान रूप से लागू करतीं, लेकिन कई बार राजनीतिक सुविधा ने संवैधानिक सिद्धांतों पर विजय प्राप्त कर ली। कांग्रेस के भीतर भी ऐसे लोग रहे जिन्हें आरएसएस के प्रति सहानुभूति रखने वाला माना जाता था, और इसी कारण सरकारें इस विषय पर आवश्यक कठोरता नहीं दिखा सकीं।

इतिहास हमें एक महत्वपूर्ण सीख देता है। महात्मा गांधी की हत्या के बाद भारत सरकार ने आरएसएस पर प्रतिबंध लगाया था। उस समय स्वतंत्र भारत के नेताओं के सामने एक कठिन प्रश्न था लोकतांत्रिक स्वतंत्रताओं की रक्षा की जाए या उन संगठनों पर कठोर कार्रवाई की जाए जिन्हें सार्वजनिक व्यवस्था के लिए चुनौती माना जा रहा था। अंततः भारत ने एक संवैधानिक लोकतंत्र का मार्ग चुना, जहाँ संगठन बनाने और विचार व्यक्त करने की स्वतंत्रता तो होगी, लेकिन साथ ही संसद द्वारा बनाए गए कानूनों के अंतर्गत प्रत्येक संगठन उत्तरदायी भी होगा।

आज भी यही संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। संगठन बनाने की स्वतंत्रता का अर्थ कानून से छूट नहीं होता। लोकतंत्र तभी मजबूत होता है जब प्रत्येक संगठन यह स्वीकार करे कि वह संविधान के अधीन है, संविधान से ऊपर नहीं।

कोई व्यक्ति आरएसएस की विचारधारा से सहमत हो या असहमत यह इस बहस का मुख्य विषय नहीं है।

मुख्य प्रश्न यह है कि क्या भारत की संवैधानिक संस्थाओं का सम्मान किया जाएगा? यदि कोई गृह मंत्री संविधान और कानून द्वारा प्रदत्त अधिकारों का प्रयोग करते हुए किसी संगठन से जानकारी मांगता है, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था में उचित उत्तर यह होना चाहिए कि या तो कानून के अनुसार जानकारी दी जाए, या यदि असहमति हो तो न्यायालय का दरवाजा खटखटाया जाए।

लेकिन किसी संवैधानिक पद का उपहास उड़ाना और उसकी तुलना किसी संगठन की आयु से करना लोकतांत्रिक परंपरा के अनुरूप नहीं है।

इस विषय पर मैं कर्नाटक के गृह मंत्री के उस अधिकार का समर्थन करता हूँ जिसके अंतर्गत वे कानून के अनुसार आवश्यक जानकारी मांग रहे हैं। जब कोई संवैधानिक पदाधिकारी अपने वैधानिक अधिकारों का प्रयोग करता है, तो उसका सम्मान किया जाना चाहिए, क्योंकि वह किसी व्यक्ति का नहीं, बल्कि संविधान का अधिकार होता है।

भारत का लोकतंत्र तब मजबूत नहीं होगा जब शक्तिशाली संगठन जांच और जवाबदेही से बचने का प्रयास करें। भारत का लोकतंत्र तब मजबूत होगा जब प्रत्येक नागरिक, प्रत्येक राजनीतिक दल, प्रत्येक धार्मिक संगठन और प्रत्येक संस्था एक मूलभूत सिद्धांत को स्वीकार करेगी भारत के संविधान से ऊपर कोई नहीं है।

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