भारत एक और साल की राजनीतिक निष्क्रियता बर्दाश्त नहीं कर सकता

 भारत एक और साल की राजनीतिक निष्क्रियता बर्दाश्त नहीं कर सकता

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आज राहुल गांधी ने एक गंभीर दावा किया। उन्होंने संकेत दिया कि नरेंद्र मोदी के आसपास की व्यवस्था के भीतर बेचैनी बढ़ रही है और उनके अंदरूनी सूत्रों से मिल रहे संदेश यह बता रहे हैं कि सिस्टम में दरारें पड़नी शुरू हो गई हैं। अगर यह केवल राजनीतिक बयानबाज़ी है, तो यह भी बाकी बयानों की तरह समय के साथ खत्म हो जाएगी। लेकिन अगर इसमें थोड़ी भी सच्चाई है, तो देश के सामने चुनावी राजनीति से कहीं बड़ा सवाल खड़ा है।

फिर एक साल इंतज़ार क्यों?

अगर सिस्टम के भीतर बैठे प्रभावशाली लोग सच में मानते हैं कि भारत का आर्थिक भविष्य, लोकतांत्रिक संस्थाएँ और सामाजिक स्थिरता खतरे में हैं, तो चुप रहना अब तटस्थता नहीं है। चुप्पी अब साझेदारी है। जो लोग जानते हैं कि कुछ गलत हो रहा है लेकिन राजनीतिक सुविधा का इंतज़ार कर रहे हैं, वे देश को नहीं बचा रहे। वे केवल खुद को बचा रहे हैं।

भारत कोई छोटा या सुरक्षित देश नहीं है जो संस्थागत पतन को आसानी से झेल लेगा। यह 1.4 अरब लोगों का राष्ट्र है। यहाँ आर्थिक गिरावट केवल बाज़ार की समस्या नहीं होगी। यह आधुनिक इतिहास की सबसे बड़ी मानवीय त्रासदियों में बदल सकती है। बढ़ती बेरोज़गारी, छात्रों का गुस्सा, महंगाई और संस्थाओं के प्रति अविश्वास पहले ही समाज के भीतर दबाव पैदा कर रहे हैं।

खतरा केवल किसी एक पार्टी की हार या जीत का नहीं है। असली खतरा अनियंत्रित जनाक्रोश है।

राहुल गांधी की यह चेतावनी कि सिस्टम के भीतर घबराहट बढ़ रही है, पूरी तरह अवास्तविक नहीं लगती। समाज के बड़े हिस्से में उन संस्थाओं के प्रति गुस्सा बढ़ रहा है जिन्हें कभी अछूत माना जाता था। चुनाव आयोग, ईडी, सीबीआई, न्यायपालिका के कुछ हिस्से और नौकरशाही के कुछ वर्ग आज जनता के संदेह के घेरे में हैं। यह सही है या गलत, यह अलग बहस हो सकती है, लेकिन यह धारणा गहरी हो चुकी है कि संस्थाएँ निष्पक्ष नहीं रहीं। और जब जनता का विश्वास संस्थाओं से टूट जाता है, तो उसे वापस लाना चुनाव जीतने से कहीं कठिन होता है।

इतिहास गवाह है कि जब संस्थाएँ कमजोर होती हैं, तब अवसरवादी ताकतें मजबूत हो जाती हैं।

छात्रों का असंतोष, आर्थिक चिंता और राजनीतिक ध्रुवीकरण ऐसे हालात पैदा कर रहे हैं जहाँ कट्टर और अराजक ताकतें जन्म ले सकती हैं। कुछ राष्ट्रवाद के नाम पर उभरेंगी, कुछ व्यवस्था विरोध के नाम पर। भारत के विरोधी बाहरी तत्व भी घरेलू अस्थिरता को अपने हित में इस्तेमाल करने की कोशिश कर सकते हैं। अगर राजनीतिक नेतृत्व यह मानकर चलता रहा कि उसके पास अभी बहुत समय है, तो हिंसा, अराजकता और टकराव की स्थिति पैदा होना असंभव नहीं है।

यही कारण है कि नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू जैसे नेता अब हमेशा के लिए किनारे बैठकर इंतज़ार नहीं कर सकते। राजनीतिक अस्तित्व राष्ट्रीय स्थिरता से बड़ा नहीं हो सकता। किसी किसी मोड़ पर नेताओं को यह तय करना ही होगा कि वे केवल सत्ता बचाना चाहते हैं या गणतंत्र भी।

लेकिन विपक्ष के सामने भी अपनी चुनौती है।

केवल गुस्से से राष्ट्रीय विकल्प तैयार नहीं होता।

व्यवस्था विरोधी आक्रामक भाषण लोगों का ध्यान खींच सकते हैं, लेकिन ध्यान ही शासन नहीं होता। एक नेता जो हर समय व्यवस्था के खिलाफ चिल्लाता है, वह सुर्खियाँ तो बटोर सकता है, लेकिन देश नहीं चला सकता। भारत यह पहले भी देख चुका है।

अरविंद केजरीवाल अन्ना हज़ारे आंदोलन से निकले थे। उनके साथ सम्मानित लोग जुड़े, जनता का भरोसा था और एक वैकल्पिक राजनीति का सपना था। समय के साथ आलोचनाओं और राजनीतिक गलतियों के बावजूद उनकी पार्टी ने कई ऐसे मॉडल दिए जिन्हें बाद में दूसरी पार्टियों ने भी अपनाया। कई राज्यों में कांग्रेस ने भी उनकी राजनीति की भाषा और वादों को अपनाया। इससे केजरीवाल की राजनीतिक विशिष्टता कम हुई, लेकिन उनके कुछ विचार सही साबित हुए।

लेकिन लगातार गुस्से की राजनीति की भी एक सीमा होती है।

आर्थिक संकट झेल रहा देश केवल विद्रोह नहीं चाहता। उसे पुनर्निर्माण चाहिए। उसे विश्वसनीयता चाहिए। उसे प्रशासनिक क्षमता चाहिए। उसे ऐसे गठबंधन चाहिए जो दबाव में टूटें नहीं।

यहीं कांग्रेस पार्टी फिर से प्रासंगिक होती दिखाई दे रही है।

कई वर्षों तक राहुल गांधी को पार्टी की कमजोरी बताया गया। लेकिन आज तस्वीर बदल रही है। INDIA गठबंधन के भीतर कई नेता उन्हें एक ऐसे चेहरे के रूप में देखने लगे हैं जो अलग-अलग विपक्षी ताकतों को एकजुट कर सकता है। दक्षिण भारत के नेताओं के पास प्रशासनिक अनुभव है, मजबूत क्षेत्रीय आधार है और कई अच्छे विचार भी हैं। लेकिन भारत में राष्ट्रीय नेतृत्व केवल दक्षिण या केवल उत्तर से तय नहीं होता। इसके लिए पूरे देश में स्वीकार्यता चाहिए। और यह समीकरण अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।

कांग्रेस, अपनी तमाम ऐतिहासिक गलतियों और बोझ के बावजूद, आज भी देश की एकमात्र ऐसी विपक्षी पार्टी है जिसके पास वास्तविक राष्ट्रीय संगठनात्मक ढांचा मौजूद है। और शायद यही कारण है कि देश का एक बड़ा वर्ग उसे फिर से एक मौका देने के लिए तैयार दिखाई दे रहा है। इसलिए नहीं कि लोग अतीत भूल गए हैं, बल्कि इसलिए कि वे भविष्य से डरने लगे हैं।

भारत आज एक खतरनाक मोड़ पर खड़ा है।

एक रास्ता संस्थागत सुधार, आर्थिक पुनर्निर्माण और लोकतांत्रिक संतुलन की ओर जाता है। दूसरा रास्ता और गहरे ध्रुवीकरण, आर्थिक अस्थिरता और ऐसे जनाक्रोश की ओर, जिसे बाद में कोई नियंत्रित नहीं कर पाएगा।

अगर राहुल गांधी सच में मानते हैं कि सिस्टम के भीतर विद्रोह की स्थिति बन रही है, तो यह केवल भाषण देने का समय नहीं है। यह कार्रवाई का समय है। गठबंधन मजबूत करने का समय है। संस्थाओं से संवाद का समय है। देश के सामने स्पष्ट दिशा रखने का समय है।

इतिहास नेताओं के सहज होने का इंतज़ार नहीं करता। और राष्ट्र केवल नारों के सहारे हमेशा ज़िंदा नहीं रहते।

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