किसी राष्ट्र के लिए सबसे बड़ा खतरा उसके नेता नहीं, बल्कि उनके अंधभक्त होते हैं
किसी
राष्ट्र के लिए सबसे बड़ा खतरा उसके नेता नहीं, बल्कि उनके अंधभक्त होते हैं
दशकों तक अमेरिका स्वयं को
दुनिया की निर्विवाद महाशक्ति के रूप में प्रस्तुत करता रहा। फिर ईरान के साथ संघर्ष
ने दुनिया को यह याद दिला दिया कि सबसे शक्तिशाली सैन्य ताकत की भी अपनी सीमाएँ होती
हैं। किसी राष्ट्र की शक्ति भाषणों, नारों या सैन्य परेड से नहीं मापी जाती। उसकी वास्तविक
शक्ति तब दिखाई देती है जब उसकी क्षमता कठिन परिस्थितियों में परखी जाती है। भारत ने
भी कुछ ऐसा ही दौर देखा है, लेकिन एक अलग रूप में। वर्षों तक भारत गर्व से स्वयं को
दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहता रहा। आज अनेक भारतीय यह प्रश्न पूछने लगे हैं कि
क्या लोकतंत्र धीरे-धीरे ऐसी व्यवस्था में बदल रहा है, जहाँ जनमत को निष्पक्ष संवाद
के बजाय पक्षपाती मीडिया, संस्थाओं पर राजनीतिक प्रभाव और सत्ता से प्रश्न पूछने के
बढ़ते भय के माध्यम से प्रभावित किया जा रहा है। कोई इस निष्कर्ष से सहमत हो या न हो,
लेकिन यह प्रश्न अवश्य पूछा जाना चाहिए।
मुझे चिंता केवल नरेंद्र मोदी
से नहीं है। सत्ता की इच्छा तो हर राजनेता में होती है। मेरी बड़ी चिंता उन नागरिकों
को लेकर है जो अपने पसंदीदा नेता द्वारा किए गए लगभग हर कार्य को सही ठहराने के लिए
तैयार दिखाई देते हैं। लोकतंत्र इसलिए कमजोर नहीं होता कि नेता सत्ता चाहते हैं—ऐसा
तो हमेशा से होता आया है। लोकतंत्र तब कमजोर होता है जब नागरिक अपने चुने हुए नेताओं
से जवाबदेही माँगना बंद कर देते हैं।
राम मंदिर से जुड़ी कथित वित्तीय
अनियमितताओं पर चल रही बहस के दौरान मैंने एक ऐसी दलील सुनी जिसने मुझे वास्तव में
चौंका दिया। कुछ लोगों का कहना था कि एक बार भगवान के नाम पर दान दे दिया जाए, तो उसके
बाद उस धन का क्या हुआ, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। यदि समाज का एक छोटा-सा हिस्सा भी
ऐसा सोचता है, तो इसका अर्थ है कि जवाबदेही का महत्व ही समाप्त हो गया है। आस्था के
नाम पर दिया गया दान सबसे अधिक पारदर्शिता की माँग करता है, सबसे कम की नहीं। धर्म
कभी भी किसी को सार्वजनिक जवाबदेही से बचने का लाइसेंस नहीं बनना चाहिए।
यहीं एक और प्रश्न खड़ा होता
है, जिस पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। दशकों से भारतीयों को सोमनाथ मंदिर की
लूट का इतिहास पढ़ाया जाता है। वह हमारे इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है और आज भी
राजनीतिक भाषणों में ऐतिहासिक अन्याय के प्रतीक के रूप में उसका उल्लेख किया जाता है।
यदि उस इतिहास को बार-बार याद रखना आवश्यक है, तो फिर राम मंदिर से जुड़े प्रश्नों
को अलग दृष्टि से क्यों देखा जाए? यदि सदियों पहले किसी धार्मिक स्थल पर हुई घटना जवाबदेही
का विषय हो सकती है, तो वर्तमान में किसी धार्मिक संस्था पर उठे प्रश्न भी उसी कसौटी
पर क्यों नहीं परखे जाने चाहिए? या तो हम मानें कि पारदर्शिता हर संस्था पर समान रूप
से लागू होती है, या फिर स्वीकार कर लें कि इतिहास का उपयोग केवल तब किया जाता है जब
वह राजनीतिक रूप से लाभदायक हो। अतीत को राजनीतिक हथियार बनाया जाए और वर्तमान में
जवाबदेही से बचा जाए—यह दोहरा मापदंड किसी लोकतंत्र को मजबूत नहीं करता।
यही प्रवृत्ति अन्य क्षेत्रों
में भी दिखाई देती है। एक राजनीतिक दल से जुड़े आरोप महीनों तक राष्ट्रीय मीडिया की
सुर्खियाँ बने रहते हैं, जबकि दूसरे दल से जुड़े आरोपों पर अपेक्षाकृत बहुत कम चर्चा
होती है। कोई इस धारणा से सहमत हो या न हो, लेकिन बड़ी संख्या में नागरिक यह महसूस
करने लगे हैं कि मीडिया के कुछ वर्गों के लिए मुद्दा नहीं, बल्कि आरोपी का राजनीतिक
परिचय अधिक महत्वपूर्ण होता है। जब लोगों का यह विश्वास टूटने लगता है कि हर आरोप की
समान गंभीरता से जांच होगी, तब संस्थाओं पर जनता का भरोसा भी धीरे-धीरे कमजोर होने
लगता है। यदि न्याय, पत्रकारिता और जनाक्रोश भी चयनात्मक हो जाएँ, तो लोकतंत्र लंबे
समय तक जीवित नहीं रह सकता।
हाल ही में मेरी बातचीत भाजपा
के एक समर्थक से हुई, जो मुझे यह समझाने का प्रयास कर रहे थे कि गुरमीत राम रहीम सिंह
निर्दोष हैं, जबकि भारतीय न्यायालय उन्हें अपराधों के लिए दोषी ठहरा चुका है। इस बातचीत
ने एक बहुत बड़े संकट की ओर मेरा ध्यान खींचा। किसी न्यायिक निर्णय से असहमति हो सकती
है, उसकी आलोचना की जा सकती है, उसके विरुद्ध अपील की जा सकती है। लेकिन केवल इसलिए
हर असुविधाजनक निर्णय को अस्वीकार कर देना कि वह हमारी राजनीतिक या धार्मिक निष्ठा
के विरुद्ध है, लोकतंत्र की उन संस्थाओं को कमजोर करता है जिन पर पूरा लोकतांत्रिक
ढाँचा टिका हुआ है। उस स्थिति में प्रमाणों का महत्व कम हो जाता है और पहचान तथा निष्ठा
सत्य से अधिक महत्वपूर्ण बन जाती है।
यही मानसिकता आज सार्वजनिक
जीवन के अनेक क्षेत्रों में दिखाई देती है। लाखों युवा परीक्षा-पत्र लीक, भर्ती में
देरी, बेरोज़गारी और एक ऐसे शिक्षा तंत्र को लेकर निराश हैं, जो उनकी अपेक्षाओं पर
खरा नहीं उतर रहा। दूसरी ओर महँगाई लगातार आम परिवारों की क्रय-शक्ति को कम कर रही
है। भोजन, ईंधन, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और रोज़मर्रा की आवश्यक वस्तुओं की कीमतें
लगातार बढ़ रही हैं। लेकिन इन मुद्दों पर राष्ट्रीय बहस होने के बजाय सार्वजनिक विमर्श
बार-बार धार्मिक प्रतीकों, राजनीतिक टकराव और चुनावी रणनीतियों में उलझ जाता है। किसी
भी सरकार का पहला दायित्व अगला चुनाव जीतना नहीं, बल्कि चुनावों के बीच नागरिकों की
समस्याओं का समाधान करना होना चाहिए।
शायद आधुनिक राजनीतिक प्रचार
की सबसे बड़ी सफलता यह नहीं है कि उसने लोगों को यह विश्वास दिला दिया कि सरकारें कभी
असफल नहीं होतीं। उसकी सबसे बड़ी सफलता यह है कि उसने लोगों को यह विश्वास दिला दिया
है कि सरकारों की असफलताएँ अब महत्वपूर्ण ही नहीं रहीं। भ्रष्टाचार सामान्य लगने लगता
है। संस्थागत विफलताएँ रोज़मर्रा की बात बन जाती हैं। सार्वजनिक धन गायब हो जाता है,
लेकिन समाज में वैसा आक्रोश पैदा नहीं होता जैसा होना चाहिए। योग्य युवाओं के अवसर
राजनीति की भेंट चढ़ जाते हैं और नागरिक धीरे-धीरे अपनी अपेक्षाएँ कम कर देते हैं,
मानो व्यवस्था का ऐसा होना स्वाभाविक हो। यह सब केवल राजनेता अकेले नहीं कर सकते। इसके
लिए उन्हें ऐसे समर्थकों की आवश्यकता होती है जो हर निर्णय का बचाव करें, हर विफलता
को सही ठहराएँ, हर आरोप को नकार दें और हर असुविधाजनक प्रश्न पूछने वाले पर ही हमला
कर दें।
इतिहास बार-बार हमें यही सिखाता
है कि कोई भी राष्ट्र केवल भ्रष्ट नेताओं के कारण नष्ट नहीं होता। राष्ट्र तब कमजोर
होने लगते हैं जब पर्याप्त संख्या में नागरिक यह मान लेते हैं कि जवाबदेही से अधिक
महत्वपूर्ण निष्ठा है। लोकतंत्र एक दिन में समाप्त नहीं होता। वह धीरे-धीरे क्षीण होता
है, जब संस्थाओं पर जनता का विश्वास टूटने लगता है और संवैधानिक मूल्यों की जगह व्यक्तिपूजा
ले लेती है।
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