जब "विश्व गुरु" नंगा हो गया
जब
"विश्व गुरु" नंगा हो गया
अगर केवल नारे लगाने से कोई
देश महान बन जाता, तो भारत कई वर्ष पहले ही विश्व गुरु बन चुका होता। अगर भाषण देने
से वैज्ञानिक पैदा होते, तो हर राजनीतिक रैली के अंत में एक नोबेल पुरस्कार विजेता
निकलता। अगर ब्रांडिंग ही शिक्षा का स्थान ले सकती, तो हर होर्डिंग एक विश्वविद्यालय
कहलाता। लेकिन दुनिया बड़ी ज़िद्दी है। वह किसी देश को उसके नारों से नहीं, बल्कि उसके
स्कूलों, विश्वविद्यालयों, वैज्ञानिक खोजों, आविष्कारों और शिक्षित नागरिकों से पहचानती
है।
पिछले बारह वर्षों में शायद
स्वतंत्र भारत का सबसे सफल राजनीतिक मार्केटिंग अभियान देश को बेचा गया है "विश्व
गुरु।" स्कूल बंद हो रहे हैं? विश्व गुरु। विश्वविद्यालय संघर्ष कर रहे हैं? विश्व
गुरु। करोड़ों छात्रों के सपनों को कुचलने वाले पेपर लीक हो रहे हैं? विश्व गुरु। पढ़े-लिखे
युवाओं में बेरोज़गारी बढ़ रही है? विश्व गुरु। ऐसा लगता है कि यह नारा भारत का नया
फेविकोल बन गया है हर समस्या पर चिपका दो, बस समस्या ही नहीं जुड़ती।
सामान्य बुद्धि तो यही कहती
है कि दुनिया का गुरु बनने के लिए पहले दुनिया के सबसे अच्छे विद्यार्थी तैयार करने
पड़ते हैं। लेकिन भारत ने पिछले कुछ वर्षों में हजारों सरकारी स्कूल बंद होते देखे
हैं। अच्छी शिक्षा इतनी महंगी होती चली गई कि मध्यम वर्ग के परिवार अपने बच्चों को
पढ़ाने के लिए कर्ज़ और समझौते करने पर मजबूर हो गए। जो बच्चे किसी तरह इस दौड़ को
पार करते हैं, वे वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। कोचिंग उद्योग
अरबों का कारोबार बन जाता है। और फिर परीक्षा से ठीक पहले किसी के घर प्रश्न-पत्र पहुँच
जाता है। सोचिए, कोई खिलाड़ी वर्षों तक ओलंपिक की तैयारी करे और फाइनल से एक रात पहले
उसे पता चले कि स्वर्ण पदक की नीलामी पहले ही हो चुकी है। शिक्षा का इससे बड़ा मज़ाक
क्या होगा? ईमानदार छात्रों से कहा जाता है कि मेहनत करो, भविष्य तुम्हारा है, लेकिन
व्यवस्था उन्हें यह भी भरोसा नहीं दे सकती कि प्रश्न-पत्र सुरक्षित रहेगा। और फिर हमसे
उम्मीद की जाती है कि यही व्यवस्था पूरी दुनिया को शिक्षा देने जा रही है।
इस नारे की सबसे बड़ी खूबी
यह है कि यह लोगों को मंज़िल का जश्न मनाने के लिए कहता है, जबकि ट्रेन अभी तक स्टेशन
से चली ही नहीं। विश्वविद्यालय बनाने की क्या ज़रूरत है, जब भाषण देकर ही दुनिया को
बताया जा सकता है कि वह भारत से सीखने वाली है? वैज्ञानिक अनुसंधान में निवेश क्यों
किया जाए, जब सोशल मीडिया पर ट्रेंड करना कहीं आसान है? आखिर यही वह नेतृत्व है जिसके
दौरान देश ने सुना कि सीवर से सीधे रसोई गैस निकाली जा सकती है, बादल लड़ाकू विमानों
को रडार से छिपा सकते हैं, और ऐसे गणितीय तर्क सुनने को मिले जिन्हें आज तक गणितज्ञ
समझने की कोशिश कर रहे हैं। शायद न्यूटन, आइंस्टीन और रामानुजन ही विज्ञान को गलत तरीके
से समझते रहे होंगे।
जवाहरलाल नेहरू की आलोचना की
जा सकती है। उनके निर्णयों पर बहस हो सकती है। यही लोकतंत्र की खूबसूरती है। लेकिन
एक सच ऐसा है जिसे कोई नारा मिटा नहीं सकता। सिलिकॉन वैली में काम करने वाले भारतीय
इंजीनियर, दुनिया भर के अस्पतालों में सेवा देने वाले डॉक्टर, नासा और अन्य संस्थानों
में काम करने वाले वैज्ञानिक, प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में पढ़ाने वाले प्रोफेसर
इनमें से अधिकांश उस शिक्षा व्यवस्था की देन हैं, जिसे दशकों पहले खड़ा किया गया था।
वे संस्थान भाषणों से नहीं बने थे। वे ईंट, सीमेंट, प्रयोगशालाओं, पुस्तकालयों, शिक्षकों
और दूरदृष्टि से बने थे। विडंबना देखिए कि उन्हीं संस्थानों से निकले अनेक लोग आज उन्हें
बनाने वालों को कोसते हैं और उस नारे पर तालियाँ बजाते हैं जिसने अभी तक वैसा एक भी
संस्थान खड़ा नहीं किया। इससे भी बड़ी विडंबना यह है कि विश्व गुरु का सपना किसी वैज्ञानिक,
किसी शिक्षक या किसी नोबेल पुरस्कार विजेता ने नहीं बेचा, बल्कि ऐसे राजनेता ने बेचा
जिसने स्वयं सार्वजनिक रूप से कहा कि बचपन में उसकी पढ़ाई में विशेष रुचि नहीं थी।
बिना उच्च शिक्षा के सफल होना कोई अपराध नहीं है। लेकिन पूरे देश को दुनिया का शिक्षक
बनने का सपना बेचते समय शिक्षा की अहमियत को कम करके दिखाना निश्चित रूप से एक गहरा
विरोधाभास है।
देश की राजनीति भी अजीब मोड़
पर पहुँच गई है। कभी सरकारें इस बात पर चुनाव लड़ती थीं कि कितने IIT, AIIMS, विश्वविद्यालय,
शोध संस्थान और उद्योग लगाए जाएँगे। आज बहस इस पर होती है कि पकौड़े बेचना रोजगार माना
जाए या नहीं। मेहनत का हर काम सम्मान के योग्य है। चाय बेचना हो या बड़ी कंपनी चलाना
हर ईमानदार काम सम्मानित होना चाहिए। लेकिन दुनिया का कोई भी विकसित देश अपने इंजीनियरों
और विज्ञान के छात्रों को सड़क किनारे ठेला लगाने की सलाह देकर महाशक्ति नहीं बना।
जापान ने ऐसा नहीं किया। दक्षिण कोरिया ने ऐसा नहीं किया। चीन ने ऐसा नहीं किया। वे
अपने युवाओं से कहते हैं रॉकेट बनाओ, नई दवाइयाँ खोजो, नई तकनीक विकसित करो, दुनिया
बदलो। और हम अभी भी यह तय करने में लगे हैं कि पकौड़े बेचना रोजगार नीति है या नहीं।
शायद यही वह गुप्त सूत्र है जिसे दुनिया अब तक समझ ही नहीं पाई, इसलिए वह अभी तक विश्व
गुरु नहीं बन सकी।
मुझे पहली बार लगा कि यह नारा
केवल राजनीतिक प्रचार नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय विश्वास बन चुका है, जब एक प्रसिद्ध
बॉलीवुड गायिका ने सार्वजनिक रूप से कहा कि उन्होंने इस सरकार को मौका देकर गलती की।
तब मुझे एहसास हुआ कि करोड़ों लोग सचमुच यह मान बैठे थे कि भारत ज्ञान, शिक्षा और विज्ञान
में दुनिया का नेतृत्व करने जा रहा है। लेकिन उनके हिस्से में आई महंगी शिक्षा, बार-बार
होने वाले पेपर लीक, घटते अवसर, बढ़ती बेरोज़गारी और अंतहीन भाषण जो उन्हें समझाते
रहे कि इन सबके बावजूद गर्व करते रहो।
इस नारे की असली ताकत इसकी
राजनीति में है। यह सरकार को उपलब्धियाँ साबित करने की ज़िम्मेदारी से मुक्त कर देता
है। पहले लोगों को महान महसूस कराइए, फिर वे महानता का प्रमाण माँगना ही छोड़ देंगे।
रिपोर्ट कार्ड की जगह तालियाँ ले लेंगी। संस्थानों की जगह इमेज मैनेजमेंट आ जाएगा।
प्रदर्शन की जगह प्रचार बैठ जाएगा। और जब कोई सवाल पूछेगा, तो उसे देशभक्ति का प्रमाणपत्र
दिखाने को कह दिया जाएगा।
शायद विश्व गुरु बनना सचमुच
इतना आसान है। न स्कूल चाहिए, न प्रयोगशालाएँ, न शोध, न नोबेल पुरस्कार। बस भाषण होने
चाहिए, नारे होने चाहिए, कैमरे होने चाहिए और ऐसे लोग होने चाहिए जो आत्मविश्वास और
योग्यता के बीच का अंतर भूल जाएँ। बाकी दुनिया शायद अपने आप भारत की शिष्या बन जाएगी।
लेकिन इतिहास बड़ा निर्दयी
परीक्षक है। वह भाषणों पर अंक नहीं देता। वह नारों पर डिग्री नहीं बाँटता। वह केवल
एक प्रश्न पूछता है
"तुम्हारे शिक्षक कहाँ
हैं?"
जिस दिन भारत इस प्रश्न का
उत्तर नारों से नहीं, बल्कि स्कूलों, विश्वविद्यालयों, वैज्ञानिक खोजों, नोबेल पुरस्कारों,
शोध संस्थानों और शिक्षित पीढ़ियों से देगा, उसी दिन दुनिया उसे विश्व गुरु कहेगी।
उससे पहले नहीं।
Yes yaqinan yadi lambi lambi fekane sesaflta mil jaati to sure aaj Bharat vishwa guru hota.
ReplyDeleteइस मामले में तो भारत पहले ही विश्व गुरु बन चुका है। जितनी बड़ी-बड़ी बातें मोदी जी ने दुनिया के अलग-अलग मंचों पर की हैं, अब तो दूसरे देशों में भी उन पर मीम बनने लगे हैं। विश्व गुरु बनने का दावा करना आसान है, लेकिन दुनिया सम्मान काम से देती है, दावों से नहीं।
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