भाजपा का सबसे बड़ा हथियार कभी लोकप्रियता नहीं था। वह था डर।
भाजपा का सबसे बड़ा हथियार कभी लोकप्रियता नहीं था। वह था डर।
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वर्षों से राजनीतिक विश्लेषक यह समझाने की कोशिश करते रहे हैं कि नरेंद्र मोदी और भाजपा की चुनावी सफलता का वास्तविक कारण क्या है। कुछ लोग इसका श्रेय नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व को देते हैं, कुछ राष्ट्रवाद, कल्याणकारी योजनाओं, धार्मिक ध्रुवीकरण, मीडिया रणनीति या कमजोर विपक्ष को इसका कारण मानते हैं। मेरी राय में ये सभी विश्लेषण उस एक सबसे महत्वपूर्ण कारण को नज़रअंदाज़ कर देते हैं जिसने पिछले एक दशक में सबसे बड़ी भूमिका निभाई है डर। मेरा आशय केवल आम मतदाताओं के डर से नहीं है। मेरा आशय उस भय से है जो उन संस्थाओं तक फैलता हुआ दिखाई देता है जिनसे स्वतंत्र रूप से काम करने की अपेक्षा की जाती है। नौकरशाह ऐसे निर्णय लेने से हिचकते हैं जो सरकार को पसंद न आएँ। राजनीतिक नेता खुलकर बोलने से पहले उसके व्यक्तिगत परिणामों का हिसाब लगाते हैं। मीडिया का एक बड़ा हिस्सा सरकार की असफलताएँ स्पष्ट दिखाई देने के बावजूद उसकी प्रशंसा करता रहता है, जबकि न्यायपालिका को भी इस बात के लिए बढ़ती आलोचना का सामना करना पड़ रहा है कि क्या उसने संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए पर्याप्त दृढ़ता दिखाई है। कोई इन आलोचनाओं से सहमत हो या असहमत, परंतु यह धारणा स्वयं आज भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी वास्तविकताओं में से एक बन चुकी है। डर लोकतंत्र को बदल देता है, क्योंकि लोग यह पूछना छोड़ देते हैं कि क्या सही है, और यह सोचना शुरू कर देते हैं कि क्या सुरक्षित है।
इसीलिए मेरी दृष्टि में हाल का छात्र आंदोलन केवल परीक्षा-पत्र लीक होने के विरुद्ध विरोध नहीं था। यह डर की राजनीति के विरुद्ध पहला बड़ा जनआंदोलन था। करोड़ों छात्रों के पास चुप रहने के पर्याप्त कारण थे। उन्हें अपनी परीक्षाओं की चिंता थी, अपने करियर की चिंता थी और उनके परिवार उनकी सुरक्षा को लेकर चिंतित थे। फिर भी वे सड़कों पर उतरे। विभिन्न रिपोर्टों, वीडियो और प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार छात्रों और पुलिस के बीच हिंसक झड़पें हुईं, पुलिस द्वारा अत्यधिक बल प्रयोग के आरोप लगे, बिना किसी पहचान वाले लोगों द्वारा हमले किए गए और महिला छात्रों के साथ दुर्व्यवहार के गंभीर आरोप सामने आए। यदि ये आरोप सही हैं तो उनकी स्वतंत्र और निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए, क्योंकि कानून-व्यवस्था बनाए रखने वाली एजेंसियों का काम नागरिकों की रक्षा करना है, उन्हें भयभीत करना नहीं। मेरी राय में उद्देश्य केवल एक प्रदर्शन को समाप्त करना नहीं था, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देना था कि यदि वे भी सरकार के विरुद्ध आवाज़ उठाएँगे तो उन्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी। सत्ता के लिए डर हमेशा सबसे प्रभावी हथियारों में से एक रहा है, क्योंकि जो लोग उसे देखते हैं, वे अक्सर विरोध करने के बजाय चुप रहना चुन लेते हैं।
इसके बावजूद यह आंदोलन समाप्त नहीं हुआ। इसका एक कारण निहंग सिखों का खुला समर्थन भी था, जिन्होंने घोषणा की कि वे छात्रों की रक्षा के लिए आए हैं और यदि उन पर फिर हमला हुआ तो वे उनका बचाव करेंगे। कोई उनके इस निर्णय से सहमत हो या असहमत, लेकिन उनकी उपस्थिति ने अनेक छात्रों को यह विश्वास अवश्य दिया कि वे पूरी तरह असहाय नहीं हैं। किसी स्वस्थ लोकतंत्र में शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे नागरिकों को अपनी सुरक्षा के लिए किसी नागरिक समूह पर निर्भर नहीं होना चाहिए। यह जिम्मेदारी केवल निष्पक्ष और संवैधानिक सीमाओं में कार्य करने वाली पुलिस की होनी चाहिए।
शिक्षा मंत्री का इस्तीफ़ा शुरुआत में इस आंदोलन की सबसे बड़ी जीत माना गया। स्वाभाविक रूप से छात्रों को लगा कि सप्ताहों के संघर्ष और बलिदान के बाद सरकार को आखिरकार जिम्मेदारी स्वीकार करनी पड़ी। लेकिन मेरी राय में उसके बाद जो हुआ, उसने उस इस्तीफ़े को एक राजनीतिक नाटक में बदल दिया। एक असफल मंत्री के रूप में उनकी जवाबदेही तय करने के बजाय भाजपा नेताओं ने उनका सार्वजनिक रूप से तालियों और प्रशंसा के साथ स्वागत किया, मानो उन्होंने अपनी असफलताओं की जिम्मेदारी स्वीकार नहीं की हो, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी को बचाने के लिए कोई बलिदान दिया हो। यह दृश्य बहुत कुछ कह गया। इससे जवाबदेही का संदेश नहीं गया, बल्कि ऐसा लगा कि छात्रों के भविष्य से अधिक महत्वपूर्ण पार्टी और नेतृत्व के प्रति निष्ठा है।
इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि शिक्षा मंत्री का इस्तीफ़ा उन मूल मुद्दों का समाधान नहीं कर सका जिनके कारण छात्र सड़कों पर उतरे थे। छात्र नेताओं के अनुसार बातचीत के दौरान सरकार द्वारा किए गए अन्य महत्वपूर्ण वादे आज तक पूरे नहीं किए गए हैं। इसके विपरीत, सरकार का ध्यान उन छात्रों और नेताओं की पहचान करने की ओर जाता दिखाई दिया जिन्होंने आंदोलन में भाग लिया था। आंदोलन समाप्त होने के बाद से छात्र नेताओं के विरुद्ध जाँच, कानूनी कार्रवाई और लगातार उत्पीड़न के आरोप सामने आए हैं। यदि सरकारें सद्भावना के साथ बातचीत करती हैं तो समझौतों से विश्वास बढ़ना चाहिए। लेकिन जब वादे पूरे न हों और दूसरी ओर आंदोलन में शामिल लोगों पर दबाव बढ़ता जाए, तो विश्वास टूटना स्वाभाविक है। इस आंदोलन की वास्तविक जीत कभी केवल एक मंत्री का इस्तीफ़ा नहीं थी। विडंबना यह है कि भाजपा ने जिस प्रकार उस इस्तीफ़े का उत्सव मनाया, उससे अनेक लोगों को यह महसूस हुआ कि सरकार का उद्देश्य जवाबदेही नहीं, बल्कि केवल राजनीतिक नुकसान को नियंत्रित करना था।
इस आंदोलन ने उस व्यवस्था में पहली बार कुछ दरारें भी दिखाई, जिसे अब तक अटूट माना जा रहा था। एक यूट्यूब साक्षात्कार में सीजेपी के एक नेता ने सार्वजनिक रूप से आरोप लगाया कि उन्हें और उनके परिवार को धमकी दी गई तथा कहा गया कि यदि वे अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा चाहते हैं तो उन्हें भाजपा में शामिल हो जाना चाहिए। मैं उस साक्षात्कार का लिंक भी दूँगा ताकि पाठक स्वयं उनके बयान को सुन सकें। यदि ये आरोप सही हैं तो इनकी स्वतंत्र और निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए, क्योंकि राजनीतिक धमकी का किसी भी संवैधानिक लोकतंत्र में कोई स्थान नहीं है। इसी प्रकार आंदोलन को कवर करने वाले कुछ पत्रकारों ने यह भी रिपोर्ट किया कि सीआरपीएफ के कुछ जवान छात्रों पर बल प्रयोग करने के पक्ष में नहीं थे और उन्होंने अपने वरिष्ठ अधिकारियों से कहा कि वे अनावश्यक हिंसा का हिस्सा नहीं बनेंगे। मैं इन रिपोर्टों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं कर सकता, लेकिन यदि इनमें थोड़ी भी सच्चाई है, तो यह इस बात का संकेत होगा कि सुरक्षा बलों के भीतर आज भी ऐसे अधिकारी मौजूद हैं जो किसी राजनीतिक आदेश से ऊपर संविधान के प्रति अपनी शपथ को महत्व देते हैं। इसी तरह, यद्यपि मैं न्यायपालिका की समग्र भूमिका से संतुष्ट नहीं हूँ, फिर भी कुछ न्यायाधीशों ने संविधान की रक्षा के लिए उल्लेखनीय साहस दिखाया है, जो यह आशा जगाता है कि संस्थागत स्वतंत्रता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।
मेरी राय में इस छात्र आंदोलन का सबसे बड़ा राजनीतिक प्रभाव किसी मंत्री का इस्तीफ़ा नहीं, बल्कि विपक्ष का बदलना था। वर्षों तक विपक्ष ऐसे किसी मुद्दे की तलाश करता रहा जो पूरे देश का ध्यान आकर्षित कर सके। वह मुद्दा छात्रों ने उन्हें दिया। इस आंदोलन ने यह दिखा दिया कि जनता का गुस्सा राजनीतिक दलों की अपेक्षा कहीं अधिक गहरा है। विपक्ष ने इस बदलते जनमत को पहचाना और छात्रों की आवाज़ को संसद के भीतर पहुँचाया, जिससे यह मुद्दा केवल सड़कों तक सीमित नहीं रहा बल्कि पूरे देश की बहस बन गया। मेरी दृष्टि में छात्रों ने विपक्ष को कहीं अधिक मज़बूत किया, जितना विपक्ष ने छात्रों को किया। जैसे-जैसे विपक्ष को यह विश्वास होने लगा कि जनता का मूड बदल रहा है, वह संसद के भीतर अधिक संगठित, अधिक आत्मविश्वासी और सरकार से अधिक आक्रामक ढंग से जवाब माँगने लगा।
एक और राजनीतिक मिथक भी अब टूटता हुआ दिखाई दे रहा है। वर्षों तक भाजपा ने सफलतापूर्वक यह धारणा बनाई कि नरेंद्र मोदी का कोई विकल्प नहीं है। आज वह विश्वास पहले जितना अटूट नहीं लगता। छात्र आंदोलन ने सरकार की कमजोरियों को उजागर किया है, जनता का गुस्सा पहले से कहीं अधिक स्पष्ट दिखाई देने लगा है और विपक्ष को ऐसा मुद्दा मिल गया है जिसने विभिन्न राजनीतिक दलों को एक साझा मंच पर खड़ा कर दिया है। जो क्षेत्रीय दल आज भी सरकार को समर्थन दे रहे हैं, उन्हें यह समझना होगा कि गठबंधन की राजनीति जिम्मेदारी को समाप्त नहीं करती, बल्कि उसे साझा करती है। जो सरकार को सत्ता में बनाए रखते हैं, उन्हें उसके निर्णयों और उसके परिणामों की जिम्मेदारी भी साझा करनी पड़ती है।
इतिहास बार-बार एक ही बात सिखाता है डर के सहारे चलने वाली सरकारें अक्सर सबसे अधिक शक्तिशाली उसी समय दिखाई देती हैं, जब उनका डर लोगों के मन से समाप्त होना शुरू हो जाता है। मेरी राय में यही इस छात्र आंदोलन का सबसे बड़ा संदेश है। इसने दिखा दिया कि भारत का युवा जोखिम उठाकर भी सत्ता को चुनौती देने के लिए तैयार है, जनता का गुस्सा अब अनदेखा नहीं किया जा सकता, यदि राज्य की संस्थाओं के भीतर से सामने आई कुछ रिपोर्टें सही हैं तो आज भी ऐसे लोग मौजूद हैं जो राजनीतिक निष्ठा से ऊपर संविधान को रखते हैं, और यह धारणा कि "मोदी का कोई विकल्प नहीं है" अब पहले जैसी मज़बूत नहीं रही। यह आंदोलन भारत की राजनीति को कितना बदलता है, इसका निर्णय अंततः मतदाता करेंगे। लेकिन एक बात निश्चित है जिस दिन नागरिक डरना छोड़ देते हैं, उसी दिन डर के सहारे खड़ी सरकारों की वास्तविक परीक्षा शुरू हो जाती है।
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