क्या यह वही Gen Z क्रांति है जिसका भारत इंतज़ार कर रहा था?
क्या यह वही Gen Z क्रांति है जिसका भारत इंतज़ार कर रहा था?
क्या
यह वही Gen Z क्रांति है जिसका भारत
वर्षों से इंतज़ार कर
रहा था? क्या वह
क्षण आखिरकार आ पहुँचा है?
20 जुलाई
को दिल्ली में हुई पुलिस
कार्रवाई आने वाले वर्षों
में उन घटनाओं में
गिनी जा सकती है
जिन्हें इतिहास याद रखेगा। संसद
की ओर न्याय की
माँग लेकर बढ़ रहे
छात्रों को केवल रोका
ही नहीं गया, बल्कि
उन पर पुलिस बल
का प्रयोग किया गया और
अनेक छात्र घायल हुए। उनकी
केवल एक ही माँग
थी उन्हें सुना जाए। लेकिन
संवाद के बजाय उन्हें
लाठियों से जवाब मिला।
अनेक युवा भारतीयों के
लिए यह केवल भीड़
नियंत्रण की कार्रवाई नहीं
थी, बल्कि उस सरकार का
प्रतीक बन गई जो
उनके अनुसार अपनी ही जनता
की आवाज़ सुनने के बजाय उसे
दबाने का रास्ता चुन
रही है।
श्री
सोनम वांगचुक से जुड़ा विवाद
इस असंतोष को और गहरा
कर गया है। उनके
परिवार ने सार्वजनिक रूप
से अपनी चिंताएँ व्यक्त
करते हुए उन्हें अपनी
पसंद के अस्पताल में
स्थानांतरित करने की अनुमति
माँगी, लेकिन उनकी यह माँग
स्वीकार नहीं की गई।
विपक्षी दलों और अनेक
विधि विशेषज्ञों का कहना है
कि भारत में न्याय
में अत्यधिक विलंब होता है और
राजनीतिक रूप से संवेदनशील
मामलों ने न्यायपालिका में
जनता के विश्वास को
कमजोर किया है।
बारह
वर्ष पहले करोड़ों भारतीयों
ने नरेंद्र मोदी को इस
आशा के साथ चुना
था कि वे भ्रष्टाचार
समाप्त करेंगे और शासन व्यवस्था
में परिवर्तन लाएँगे। आज विपक्ष इसके
बिल्कुल विपरीत आरोप लगा रहा
है। उनका कहना है
कि भाजपा सरकार के दौरान भ्रष्टाचार
व्यवस्था के भीतर और
गहराई तक पहुँच गया
है तथा सत्ता का
अभूतपूर्व केंद्रीकरण हुआ है।
सबसे
अधिक निराशा शिक्षा व्यवस्था को लेकर दिखाई
दे रही है। बार-बार होने वाले
पेपर लीक ने करोड़ों
छात्रों का विश्वास हिला
दिया है। हर लीक
हुआ प्रश्नपत्र वर्षों की मेहनत और
तैयारी को बर्बाद कर
देता है तथा पूरी
परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर
प्रश्नचिह्न लगा देता है।
परीक्षा विवादों के बाद छात्रों
द्वारा आत्महत्या की घटनाओं ने
इस आक्रोश को और अधिक
बढ़ा दिया है।
नेता
प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने देहरादून की
अपनी रैली में वह
सूची सार्वजनिक रूप से दिखाई
जिसे उन्होंने पेपर लीक का
"मेन्यू" बताया और आरोप लगाया
कि अलग-अलग परीक्षाओं
के प्रश्नपत्र अलग-अलग कीमतों
पर बेचे जा रहे
थे। ये आरोप अब
राष्ट्रीय राजनीतिक बहस का हिस्सा
बन चुके हैं। विपक्ष
ने यह भी प्रश्न
उठाया है कि जिस
कंपनी को पहले ब्लैकलिस्ट
किया गया था, वह
कथित रूप से पात्रता
की शर्तों में बदलाव के
बाद परीक्षा संबंधी सरकारी ठेके प्राप्त करने
के लिए दोबारा कैसे
योग्य घोषित हो गई। विपक्ष
ने पेपर लीक नेटवर्क
और पूरी ठेका प्रक्रिया
की स्वतंत्र जाँच की माँग
की है।
आज
देश के अनेक युवा
एक सीधा प्रश्न पूछ
रहे हैं यदि पेपर
लीक हर वर्ष हो
रहे हैं, तो उनसे
लाभ किसे मिल रहा
है? प्रश्नपत्र बार-बार अपने
आप बाहर नहीं आते।
हर नए पेपर लीक,
हर नई जाँच और
हर दोबारा आयोजित परीक्षा के साथ यह
धारणा और मजबूत होती
जा रही है कि
समस्या की जड़ तक
अब भी नहीं पहुँचा
गया है। दोषियों की
पहचान करने में हर
विफलता विपक्ष द्वारा उठाए जा रहे
प्रश्नों को और अधिक
बल देती है।
मेरा
मानना है कि भाजपा
ने इस पीढ़ी के
संकल्प को कम आँका।
उसे लगा कि समय
के साथ लोगों का
गुस्सा शांत हो जाएगा।
लेकिन हर नए विवाद
ने न्याय और जवाबदेही की
माँग कर रहे युवाओं
के संकल्प को और मजबूत
किया है। जो लोग
कभी भाजपा के प्रबल समर्थक
थे, उनमें से भी अनेक
अब यह सोचने लगे
हैं कि बारह वर्ष
पहले उनसे कहीं कोई
भूल तो नहीं हुई
थी।
हाल
के विरोध प्रदर्शनों के दौरान एक
युवा प्रदर्शनकारी ने कथित रूप
से पुलिस से कहा कि
वे उसे पीटते रहें,
क्योंकि वह शहीद बनने
को तैयार है और न्याय
के लिए बार-बार
जन्म लेगा। ये शब्द उस
पीढ़ी की मनःस्थिति को
दर्शाते हैं जिसे अब
लगता है कि उसके
पास चुप रहने का
विकल्प नहीं बचा है।
संभव
है कि इतिहास 20 जुलाई
को उस दिन के
रूप में याद रखे
जब Gen Z ने सुने जाने
की विनती करना छोड़ दिया
और जवाबदेही की माँग शुरू
कर दी। यदि सचमुच
ऐसा है, तो भारत
शायद एक ऐसे आंदोलन
की शुरुआत देख रहा है
जिसे कोई भी सरकार
अनदेखा नहीं कर पाएगी।
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