राहुल गांधी की छवि नष्ट करने के लिए भाजपा ने अरबों रुपये कैसे खर्च किए?
राहुल
गांधी की छवि नष्ट करने के लिए भाजपा ने अरबों रुपये कैसे खर्च किए?
भाजपा की दीर्घकालिक राजनीतिक
रणनीति केवल राहुल गांधी को हराने की नहीं थी। उसका वास्तविक लक्ष्य कांग्रेस पार्टी
को कमजोर करना और अंततः उसे राजनीतिक रूप से समाप्त करना था, क्योंकि दशकों से कांग्रेस
ही उसकी सबसे बड़ी राष्ट्रीय प्रतिद्वंद्वी रही है। उस लक्ष्य तक पहुँचने के लिए सबसे
पहले उस नेता की विश्वसनीयता को नष्ट करना आवश्यक था, जिसके नेतृत्व में कांग्रेस आज
भी एकजुट होती रही है।
दशकों से गांधी परिवार कांग्रेस
पार्टी का सबसे प्रभावशाली परिवार रहा है। देशभर के कांग्रेस नेताओं ने किसी भी अन्य
नेता की तुलना में गांधी परिवार पर अधिक विश्वास जताया है। यहाँ तक कि जब डॉ. मनमोहन
सिंह प्रधानमंत्री बने, तब भी उनका चयन गांधी परिवार के समर्थन से हुआ। कोई इस पर सहमत
हो या असहमत, इसमें बहुत कम संदेह है कि कांग्रेस की पहचान और नेतृत्व के केंद्र में
गांधी परिवार ही रहा है। ऐसे में राहुल गांधी को कमजोर करना, कांग्रेस को कमजोर करने
का सबसे प्रभावी तरीका माना गया।
पिछले एक दशक में भाजपा की
सबसे बड़ी राजनीतिक परियोजनाओं में से एक राहुल गांधी की सार्वजनिक छवि को नष्ट करना
रही है। रणनीति बेहद सरल थी एक ही आरोपों और उपनामों को बार-बार, अलग-अलग लोगों के
माध्यम से दोहराओ, ताकि वे धीरे-धीरे लोगों के मन में सच जैसे स्थापित हो जाएँ। भले
ही लोग उन आरोपों पर पूरी तरह विश्वास न करें, लेकिन लगातार दोहराव उन्हें यह सोचने
पर मजबूर कर देता है "कहीं यह सच तो नहीं?"
वर्षों तक राहुल गांधी को
"पप्पू", मूर्ख, हिंदू विरोधी, पाकिस्तान समर्थक, देशद्रोही और ऐसा व्यक्ति
बताया गया जो प्रधानमंत्री बनकर देश को बाँट देगा। ये आरोप नरेंद्र मोदी, अमित शाह,
सुब्रमण्यम स्वामी, निशिकांत दुबे, किरेन रिजिजू, कंगना रनौत और अनेक भाजपा नेताओं
तथा समर्थकों द्वारा बार-बार दोहराए गए। लेकिन इन आरोपों के साथ अक्सर एक चीज़ गायब
रही ठोस प्रमाण। ऐसा प्रतीत हुआ कि उद्देश्य राहुल गांधी के विचारों पर बहस करना नहीं,
बल्कि उनकी विश्वसनीयता को इस हद तक धूमिल करना था कि लोग उन्हें गंभीरता से लेना ही
बंद कर दें।
कई वर्षों तक यह रणनीति सफल
होती दिखाई दी। बड़ी संख्या में लोगों ने राहुल गांधी के बारे में बनाई गई छवि को बिना
परखे स्वीकार कर लिया। बार-बार दोहराया गया प्रचार लोगों की सोच को प्रभावित करने में
सफल रहा।
मैं स्वयं भी राहुल गांधी के
बारे में उतना ही जानता था, जितना मीडिया दिखाता था। लेकिन भारत जोड़ो यात्रा ने मेरी
सोच बदल दी। वर्षों से जिस व्यक्ति की छवि मेरे सामने प्रस्तुत की गई थी, उसकी जगह
मैंने एक ऐसे नेता को देखा जो पूरे देश में पैदल चलकर आम लोगों से मिल रहा था, उनकी
बातें सुन रहा था और देश को जोड़ने की बात कर रहा था। उसी समय मुझे लगा कि भाजपा हिंदू-मुस्लिम
ध्रुवीकरण की राजनीति में अधिक व्यस्त है, जबकि बेरोज़गारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, भ्रष्टाचार
और अर्थव्यवस्था जैसे मुद्दे कहीं पीछे छूटते जा रहे हैं।
मोरबी पुल दुर्घटना जैसी घटनाओं
ने शासन और जवाबदेही को लेकर मेरी चिंताओं को और गहरा किया। मैंने यह भी देखा कि राहुल
गांधी ने न केवल भाजपा बल्कि आरएसएस को भी खुलकर चुनौती दी। उनके खिलाफ अनेक मुकदमे
दर्ज हुए, लगातार राजनीतिक हमले हुए, लेकिन उन्होंने पीछे हटने के बजाय अपनी लड़ाई
जारी रखी।
समय के साथ राहुल गांधी की
राजनीतिक स्वीकार्यता बढ़ती चली गई। आज वे भारत ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर
पर भी सबसे अधिक पहचाने जाने वाले विपक्षी नेताओं में से एक हैं। बेरोज़गारी, शिक्षा,
भ्रष्टाचार, चुनावी पारदर्शिता और शासन जैसे मुद्दों पर उठाए गए उनके प्रश्न आज राष्ट्रीय
राजनीति की चर्चा का केंद्र बन चुके हैं। इंडिया गठबंधन के अनेक नेता अब खुलकर उनके
नेतृत्व को स्वीकार कर रहे हैं। शिक्षा के मुद्दे पर चल रहे आंदोलनों में उनकी भागीदारी
को नवगठित सीजेपी जैसे संगठनों ने भी सराहा है। दूसरी ओर, कई छोटे क्षेत्रीय दलों के
नेता भी कांग्रेस में लौटने लगे हैं, क्योंकि उन्होंने देख लिया है कि भाजपा की राजनीतिक
मशीनरी के सामने छोटे दलों का टिके रहना कितना कठिन होता जा रहा है।
यदि यह सच है कि अमित शाह धार्मिक
नेताओं से लगातार मुलाकात कर रहे हैं, तो यह इस बात का संकेत हो सकता है कि राहुल गांधी
के नेतृत्व में विपक्ष की बढ़ती ताकत और सीजेपी जैसे नए संगठनों का उभार सरकार को असहज
कर रहा है। ऐसा लगता है कि विपक्ष द्वारा उठाए जा रहे मुद्दों ने सरकार को बेचैन कर
दिया है और अब वह विपक्ष को बदनाम करने के लिए नए-नए रास्ते खोज रही है। ऐसा महसूस
होता है मानो विपक्ष के खिलाफ हर संभव राजनीतिक हथियार एक साथ इस्तेमाल किया जा रहा
हो।
लेकिन भाजपा के सामने एक नई
चुनौती भी खड़ी हो गई है। कई प्रमुख धार्मिक नेताओं ने सार्वजनिक रूप से भाजपा की आलोचना
की है और उसके सनातन के प्रति समर्पण पर प्रश्न उठाए हैं। दूसरी ओर, बीफ़ उद्योग से
जुड़े व्यवसायों से चंदा लेने के आरोप और उत्तर प्रदेश में गौहत्या को लेकर उठे सवाल
भी राजनीतिक बहस का हिस्सा बन चुके हैं। अब युवा मतदाता इन मुद्दों से परिचित हैं और
राजनीतिक नारों तथा वास्तविक कार्यों के बीच के अंतर पर सवाल उठाने लगे हैं।
मुझे भारत के इतिहास में ऐसा
कोई दूसरा नेता प्रतिपक्ष याद नहीं आता जिसके खिलाफ इतनी व्यापक और लंबे समय तक चलने
वाली राजनीतिक मुहिम चलाई गई हो। वर्षों तक मीडिया के प्रभावशाली वर्गों, व्यक्तिगत
हमलों, राजनीतिक ब्रांडिंग, अदालतों में चल रहे मुकदमों और लगातार सार्वजनिक आलोचना
के माध्यम से राहुल गांधी की विश्वसनीयता को कमज़ोर करने और उनकी राजनीतिक उपस्थिति
को सीमित करने का प्रयास किया गया।
काफी समय तक यह रणनीति सफल
भी दिखाई दी। लोगों ने उनके बारे में गढ़ी गई छवि को बिना गहराई से परखे स्वीकार कर
लिया। लेकिन राजनीति में धैर्य का अपना महत्व होता है। सार्वजनिक जीवन से गायब होने
के बजाय राहुल गांधी लगातार लोगों के बीच जाते रहे। भारत जोड़ो यात्रा और उसके बाद
के अभियानों ने उनकी राजनीतिक पहचान को और मजबूत किया।
आज राहुल गांधी ऐसे नेता बन
चुके हैं जिन्हें नज़रअंदाज़ करना संभव नहीं है। विपक्ष उनके नेतृत्व में पहले से कहीं
अधिक संगठित दिखाई देता है, और जिन मुद्दों को वे उठाते हैं, वही आज राष्ट्रीय राजनीति
की दिशा तय कर रहे हैं।
विडंबना यह है कि जिस अभियान
का उद्देश्य कांग्रेस को उसके सबसे प्रमुख नेता की छवि नष्ट करके कमजोर करना था, उसी
अभियान ने ठीक उल्टा परिणाम दिया। राहुल गांधी को राजनीतिक रूप से समाप्त करने की कोशिश
ने उन्हें विपक्ष का सबसे केंद्रीय चेहरा बना दिया।
कोई राहुल गांधी का समर्थक
हो या विरोधी, आज भारतीय राजनीति पर उनके प्रभाव को नकारना संभव नहीं है। भाजपा ने
वर्षों तक और अरबों रुपये खर्च करके देश को यह विश्वास दिलाने की कोशिश की कि राहुल
गांधी कभी राष्ट्रीय नेता नहीं बन सकते। लेकिन इतिहास शायद इस अभियान को उसकी सफलता
के लिए नहीं, बल्कि इसलिए याद रखेगा कि उसने अनजाने में उसी नेता को और बड़ा बना दिया,
जिसे रोकने के लिए यह पूरा अभियान चलाया गया।
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