मोदी और शाह गिरफ्तार हो चुके हैं

 

मोदी और शाह गिरफ्तार हो चुके हैं

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मोदी और शाह अपनी ही विचारधारा के भीतर गिरफ्तार हो चुके हैं, और अब उनके लिए उससे स्वयं को मुक्त करना कठिन होता जा रहा है। संसद से उनकी दूरी, मेरी नज़र में, साफ़ दिखाती है कि वे अपने ही बनाए हुए राजनीतिक कारागार में कैद होते जा रहे हैं। दुनिया भर में बहुत से लोग श्री राहुल गांधी के बारे में अपनी राय रखते हैं, और इनमें से कई धारणाएँ उस छवि से प्रभावित हैं जिसे भाजपा ने पिछले बारह वर्षों में उनके बारे में गढ़ा है। बहुत से लोग आज भी श्री राहुल गांधी को देश के एक गंभीर संभावित नेता के रूप में नहीं देखते। इसके बजाय उन्हें ऐसे व्यक्ति के रूप में पेश किया गया जो मुँह में चाँदी का चम्मच लेकर पैदा हुआ और जिसके पास देश चलाने की आवश्यक योग्यता या अनुभव नहीं है। लेकिन लोग अक्सर भूल जाते हैं कि भारत एक लोकतंत्र है। सरकार की भूमिका मजबूत नीतियाँ बनाना, जवाबदेही सुनिश्चित करना और व्यवस्था तथा संस्थाओं को पूरी ईमानदारी और स्वतंत्रता के साथ काम करने देना होनी चाहिए।

अतीत में सरकारों ने अक्सर इससे अलग रास्ता अपनाया है। देश की व्यवस्था में अत्यधिक हस्तक्षेप और सूक्ष्म प्रबंधन ने ऐसी परिस्थितियाँ पैदा कीं जिनमें नौकरशाह और राजनेता दोनों व्यवस्था का लाभ उठा सकते थे और भ्रष्टाचार के अवसर पैदा हुए। फैसले हमेशा जनता और देश के कल्याण को सर्वोपरि रखकर नहीं किए गए। इसके बजाय विकास धीरे-धीरे ऐसी पूँजीवादी सोच की ओर बढ़ता गया जिसमें आर्थिक बोझ अंततः जनता पर ही डाल दिया गया, जबकि वही जनता अपने करों के माध्यम से उस विकास के लिए पहले ही भुगतान कर चुकी थी। भाजपा के शासनकाल में, मेरी राय में, यह और अधिक स्पष्ट दिखाई देने लगा। बुनियादी ढाँचा बनाया गया, लेकिन उसका उपयोग करने के लिए जनता को सर्विस चार्ज, टोल और दूसरी तरह की फीस चुकानी पड़ने लगी। जनता से कहा गया कि वह विकास का उत्सव मनाए, और साथ ही उसी विकास का इस्तेमाल करने के लिए अपनी जेब से लगातार भुगतान भी करती रहे।

इसी दौरान नरेंद्र मोदी को भारत के सबसे शक्तिशाली नेताओं में से एक के रूप में प्रस्तुत किया गया—लगभग इस तरह जैसे देश के लिए उन्होंने वह महान कार्य कर दिया हो जो उनके बिना कभी संभव ही नहीं था। वर्षों तक उनके चारों ओर एक छवि बड़ी सावधानी से गढ़ी गई: मोदी शक्तिशाली नेता हैं, मोदी निडर नेता हैं, मोदी के बिना भारत आगे नहीं बढ़ सकता। लेकिन कोई भी छवि केवल तब तक शक्तिशाली रहती है, जब तक लोग उस पर विश्वास करते रहते हैं। आज मेरा मानना है कि मोदी और उनकी सरकार की उस छवि को श्री राहुल गांधी के भाषणों और राजनीतिक चुनौतियों ने गंभीर रूप से चोट पहुँचाई है—ऐसी चुनौती जिसे केवल आत्मविश्वास से भरा विपक्षी नेता ही दे सकता है। राहुल गांधी ने राजनीतिक समीकरण को पलट दिया है। जिस व्यक्ति को भाजपा ने वर्षों तक कमज़ोर और अयोग्य साबित करने की कोशिश की, वही आज संसद में खड़ा होकर सरकार को सीधे चुनौती दे रहा है, जबकि मोदी और शाह उसका सामना करने से लगातार बचते हुए दिखाई देते हैं। उनके नेतृत्व की विफलता अब शायद इससे अधिक स्पष्ट नहीं हो सकती।

राहुल गांधी ने एक बार कहा था कि उन्होंने नरेंद्र मोदी के चारों ओर फुलाए गए गुब्बारे में छेद कर दिया है। राजनीतिक रूप से देखें तो आज वह रूपक पहले से कहीं अधिक सटीक दिखाई देता है। वह गुब्बारा मोदी के चारों ओर बड़ी मेहनत से बनाई गई अजेय नेता की छवि थी। गुब्बारे में एक बार छेद हो जाए तो लोगों को प्रचार से बनाई गई छवि नहीं, बल्कि उसके पीछे खड़ा वास्तविक राजनेता दिखाई देने लगता है। एक सार्वजनिक कार्यक्रम में मोदी का सामना राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और श्री मल्लिकार्जुन खरगे से भी हुआ। मोदी ने कथित तौर पर प्रियंका गांधी से पूछा कि वह कैसी हैं। जब श्री खरगे ने टिप्पणी की कि मोदी बदले-बदले से लग रहे हैं, तो मोदी वहाँ लंबे समय तक बातचीत करने के बजाय आगे बढ़ गए। लोग ऐसी मुलाकातों की अलग-अलग व्याख्या कर सकते हैं, और केवल शारीरिक हाव-भाव से यह तय नहीं किया जा सकता कि किसी व्यक्ति के मन में क्या चल रहा है। लेकिन मेरे लिए इससे एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा होता है: भारत के प्रधानमंत्री को नेता प्रतिपक्ष और विपक्ष के दूसरे वरिष्ठ नेताओं का सामना करते समय असहज क्यों दिखाई देना चाहिए? मैंने किसी बड़े लोकतंत्र के नेता को नेता प्रतिपक्ष और विपक्ष के नेताओं का सीधा सामना करने से इतना बचते हुए शायद ही कभी देखा हो।

प्रधानमंत्री भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं। जब वह अपने राजनीतिक विरोधियों के सामने खड़े होते हैं, तब वह केवल अपने परिवार, अपने निजी इतिहास या अपनी राजनीतिक पार्टी का प्रतिनिधित्व नहीं कर रहे होते; वह भारत के प्रधानमंत्री के पद पर खड़े होते हैं। उनके परिवार ने अतीत में कितनी कठिनाइयाँ देखीं, उससे न तो उन्हें छोटा समझा जाना चाहिए और न ही उस आधार पर उन्हें आलोचना से ऊपर रखा जा सकता है। किसी व्यक्ति की आर्थिक पृष्ठभूमि यह तय नहीं करती कि वह शक्तिशाली नेता है या कमज़ोर। असली कसौटी यह है कि एक अरब से अधिक लोगों का प्रतिनिधित्व करने की जिम्मेदारी मिलने के बाद वह स्वयं को किस तरह प्रस्तुत करता है और अपना दायित्व किस तरह निभाता है। एक मजबूत प्रधानमंत्री को राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे या किसी भी विपक्षी नेता के सामने आत्मविश्वास से खड़े होकर अपनी सरकार के रिकॉर्ड का बचाव करने में सक्षम होना चाहिए। लोकतंत्र की यही माँग है।

बारह वर्षों तक भाजपा राहुल गांधी के साथ "पप्पू" का ठप्पा जोड़ने में सफल रही। इसका उद्देश्य लोगों के मन में यह धारणा बैठाना था कि राहुल कमज़ोर हैं, अपरिपक्व हैं और भारत का नेतृत्व करने में सक्षम नहीं हैं। लेकिन राजनीति में हर गढ़ी हुई छवि को आखिरकार वास्तविकता की परीक्षा देनी ही पड़ती है। आज राहुल गांधी सरकार के सामने खड़े होकर सवाल पूछ रहे हैं। वह मोदी और शाह को सीधे चुनौती दे रहे हैं। राहुल गांधी से कोई सहमत हो या असहमत, लेकिन अब उन्हें राजनीतिक रूप से अप्रासंगिक कहकर खारिज करना लगातार मुश्किल होता जा रहा है। दूसरी ओर, जिन दो नेताओं ने अपनी पूरी राजनीतिक पहचान शक्ति और मजबूती की छवि के आसपास खड़ी की, वे आज उसी छवि में फँसे दिखाई देते हैं। इसीलिए मैं कहता हूँ कि मोदी और शाह अपनी ही विचारधारा में गिरफ्तार हो चुके हैं। इस जेल में लोहे की सलाखें नहीं हैं; इसकी दीवारें उसी राजनीतिक छवि से बनी हैं जिसे उन्होंने स्वयं अपने चारों ओर खड़ा किया था। और शायद सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिस व्यक्ति को उन्होंने बारह वर्षों तक कमज़ोर साबित करने की कोशिश की, आज वही उनकी उस तथाकथित ताक़त की कमज़ोरी उजागर करता दिखाई दे रहा है।

तो बारह वर्षों तक राहुल गांधी को "पप्पू" कहने के बाद शायद अब भारत के लोगों को आज की राजनीतिक वास्तविकता को देखकर वही सवाल एक बार फिर पूछना चाहिए:

असली "पप्पू" कौन है?

फैसला आप कीजिए।

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