ध्यान भटकाओ, सवालों से बचो और जवाबदेही से भागो: भाजपा का शासन मॉडल
ध्यान
भटकाओ, सवालों से बचो और जवाबदेही से भागो: भाजपा का शासन मॉडल
मेरी नज़र में भाजपा का शासन
मॉडल हमेशा से ध्यान भटकाने, भ्रम पैदा करने, राजनीतिक मार्केटिंग करने और सवालों को
दूसरी दिशा में मोड़ने का रहा है, जबकि आम भारतीयों की समस्याएँ अनुत्तरित रह जाती
हैं। नरेंद्र मोदी पहले ऐसे प्रधानमंत्री हैं जिन्हें मैंने न केवल भारत में, बल्कि
दुनिया में कहीं भी बार-बार जनता के सामने जाकर यह शिकायत करते देखा है कि लोगों ने
उन्हें गालियाँ दीं या उनकी माँ का अपमान किया। किसी प्रधानमंत्री या उनके परिवार के
खिलाफ व्यक्तिगत अपशब्दों का समर्थन नहीं किया जा सकता, लेकिन देश का नेता हर राजनीतिक
टकराव को अपनी व्यक्तिगत पीड़ा की कहानी में नहीं बदल सकता। इतिहास नरेंद्र मोदी का
मूल्यांकन उनकी सरकार के रिकॉर्ड और इस आधार पर करेगा कि जब जनता तथा उसके चुने हुए
प्रतिनिधियों ने जवाब माँगे, तब उन्होंने उनका सामना कैसे किया।
यही रणनीति पूरी भाजपा में
दिखाई देती है। भाजपा सांसद अनुराग ठाकुर ने कथित तौर पर गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ
श्री राहुल गांधी द्वारा इस्तेमाल की गई कथित असंसदीय भाषा को लेकर कार्रवाई शुरू की
है। लेकिन राहुल गांधी के शब्दों पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय क्या देश को यह नहीं
पूछना चाहिए कि गृह मंत्री उन सवालों के जवाब क्यों नहीं दे रहे हैं जो राहुल गांधी
ने उठाए हैं? प्रदर्शनकारी छात्रों पर बल प्रयोग का आदेश किसने दिया? पैलेट गन का इस्तेमाल
क्यों किया गया? छात्रों पर लाठीचार्ज क्यों किया गया? उन छात्राओं के साथ क्या हुआ
जिनके कपड़े पुलिस कार्रवाई के दौरान कथित रूप से फाड़े गए? और बिहार में एक पुलिसकर्मी[RS1]
द्वारा AK-47 चलाने की घटना को कैसे समझाया जाएगा? यदि सरकार इन घटनाओं के विवरण से
असहमत है, तो श्री शाह को संसद में आकर सरकार के तथ्य सामने रखने चाहिए और इन सवालों
के जवाब देने चाहिए। राहुल गांधी के खिलाफ एक और शिकायत दर्ज करने से इनमें से किसी
भी सवाल का जवाब नहीं मिलता।
संसद में गंभीर सवालों का सामना
करने से मोदी और शाह की अनुपस्थिति इस मामले को और भी चिंताजनक बनाती है। संसद इसलिए
है ताकि जनता के चुने हुए प्रतिनिधि सरकार से सवाल पूछ सकें। कुछ समय के लिए औपचारिक
कार्यवाही में दिखाई देना विपक्ष के सवालों का जवाब देने का विकल्प नहीं हो सकता। भाजपा
ने राहुल गांधी को अनेक कानूनी और राजनीतिक विवादों में घेरा है, जिसमें वह मानहानि
मामला भी शामिल है जिसके कारण उनकी संसद सदस्यता चली गई थी, जब तक कि सर्वोच्च न्यायालय
ने उनकी दोषसिद्धि पर रोक नहीं लगाई। इसके बावजूद राहुल गांधी संसद में खड़े होकर सरकार
को चुनौती देते रहे हैं। यदि मोदी और शाह उनसे असहमत हैं, तो उन्हें भी वहीं खड़े होकर
उनका जवाब देना चाहिए।
इस बीच देश के सामने कहीं बड़े
आर्थिक सवाल खड़े हैं। संबंधित अवधि में लगभग ₹16 लाख करोड़ के बैंक ऋण राइट-ऑफ किए
गए हैं, जबकि एक आम भारतीय से उम्मीद की जाती है कि वह अपने कर्ज़ का एक-एक रुपया चुकाए।
नागरिकों को यह पूछने का अधिकार है कि यह पैसा किसने उधार लिया, इसमें से कितना वसूल
किया गया, कितना अभी तक वसूल नहीं हुआ और सबसे अधिक लाभ किन कर्जदारों को मिला। इसी
दौरान राहुल गांधी ने मोदी के शासनकाल में गौतम अडानी की संपत्ति और कारोबार के असाधारण
विस्तार तथा कॉरपोरेट विकास, सरकारी ठेकों, सार्वजनिक संपत्तियों, वित्तपोषण और राजनीतिक
सत्ता के बीच संबंधों पर बार-बार सवाल उठाए हैं। यदि सरकार का कहना है कि सब कुछ निष्पक्ष
और पारदर्शी तरीके से हुआ है, तो उसे तथ्य संसद के सामने रखने चाहिए और देश को स्वयं
निर्णय करने देना चाहिए।
इसीलिए मुझे भाजपा का एक बार-बार
दोहराया जाने वाला फॉर्मूला दिखाई देता है: ध्यान भटकाओ, बाँटो, सवालों से बचो और मुद्दा
बदल दो। राहुल गांधी छात्रों पर हुई पुलिस कार्रवाई का सवाल पूछें तो उनकी भाषा पर
बहस शुरू कर दो। कॉरपोरेट घरानों और बैंक ऋणों पर सवाल उठें तो चर्चा कहीं और मोड़
दो। विपक्ष जवाबदेही माँगे तो कोई नया विवाद खड़ा कर दो। भारतीयों को व्यक्तियों, धर्म,
नारों और राजनीतिक तमाशों में उलझाए रखो, जबकि रोजगार, शिक्षा, भ्रष्टाचार, सार्वजनिक
संपत्तियों, बैंकिंग और महँगाई जैसे सवाल पीछे धकेल दिए जाएँ।
बारह वर्षों तक भाजपा ने भारतीयों
को यह विश्वास दिलाने के लिए पूरी ताकत लगा दी कि राहुल गांधी नरेंद्र मोदी को चुनौती
देने में सक्षम नहीं हैं। आज विडंबना को नज़रअंदाज़ करना मुश्किल है। राहुल गांधी सवाल
पूछ रहे हैं, जबकि सरकार उनके सवालों का जवाब देने के बजाय इस बात को चुनौती देने में
अधिक दिलचस्पी दिखाती है कि वे सवाल किस तरह पूछ रहे हैं।
यदि राहुल गांधी गलत हैं, तो
उन्हें गलत साबित कीजिए। यदि उनके तथ्य गलत हैं, तो सही तथ्य संसद के सामने रखिए। यदि
पुलिस ने कानून के अनुसार कार्रवाई की, तो उसकी व्याख्या कीजिए। यदि कॉरपोरेट संबंध
और बैंक लेन-देन निष्पक्ष तथा पारदर्शी थे, तो सबूत देश के सामने रखिए।
ध्यान भटकाना बंद कीजिए। सवालों
से बचना बंद कीजिए। श्री मोदी और श्री शाह, संसद में आइए और सवालों के जवाब दीजिए।
भारत की जनता को तय करने दीजिए कि सच कौन बोल रहा है।
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