जब राहुल के विमान ने देश को डरा दिया
जब
राहुल के विमान ने देश को डरा दिया
कल
जब ख़बर आई कि राहुल गांधी के विमान को लखनऊ में उतरने में दिक्कत हुई, तो हममें से
बहुत से लोग घबरा गए। तेज़ हवाओं के कारण विमान पहली कोशिश में नहीं उतर सका, उसने
दोबारा चक्कर लगाया और दूसरी कोशिश में सुरक्षित उतर गया। किसी साज़िश का कोई सबूत
नहीं है। लेकिन मुद्दा वह है ही नहीं। भारत अभी इसी साल अजित पवार की विमान दुर्घटना
में हुई मौत को भूला नहीं है। ऐसे में जब विपक्ष के नेता के विमान से जुड़ी कोई ऐसी
ख़बर आती है, तो लोगों का चिंतित होना स्वाभाविक है। शायद आज के भारत की सबसे दुखद
बात यही है कि राजनीतिक अविश्वास इतना गहरा हो चुका है कि लोगों का दिमाग़ विमान से
भी तेज़ उड़ने लगता है।
राहुल
अब वह “पप्पू” नहीं रहे, जिसे भाजपा ने वर्षों तक विज्ञापन की तरह देश को बेचने की
कोशिश की। लगता है उस प्रोडक्ट की एक्सपायरी डेट निकल चुकी है। जिस आदमी को राजनीतिक
रूप से ख़त्म मान लिया गया था, वही आज विपक्ष का नेता है, उत्साही भीड़ जुटा रहा है
और ऐसे सवाल पूछ रहा है जो मोदी और शाह का पीछा छोड़ने को तैयार नहीं हैं। भाजपा ने
वर्षों तक देश को राहुल पर हँसना सिखाया; कहीं रास्ते में देश ने राहुल पर हँसना बंद
कर दिया और उनकी बात सुननी शुरू कर दी।
अब
मोदी भी युवाओं की उसी उत्साही भीड़ का जादू दोबारा तलाशते दिखाई देते हैं। इसलिए रील्स
हैं, सोशल मीडिया है और Gen Z से जुड़ने की कोशिश है। मुश्किल बस इतनी है कि Gen Z
सोशल मीडिया के साथ बड़ी हुई है और शायद रील बनाने वालों से बेहतर जानती है कि रील
और हक़ीक़त में क्या फ़र्क होता है। परीक्षा, पेपर लीक, शिक्षा और रोज़गार से परेशान
छात्र शायद सुबह उठकर यह नहीं कहेंगे “हमारा भविष्य गया भाड़ में, लेकिन मोदी जी की
रील क्या शानदार थी!”
फिर
बात आती है भीड़ की। मोदी शायद वही स्वागत चाहते हैं जो राहुल को कई जगह मिलता दिखाई
देता है, लेकिन इसमें एक छोटी-सी परेशानी है तालियाँ तब ज़्यादा अच्छी लगती हैं जब
लोग अपनी मर्ज़ी से बजाएँ। दोस्ताना भीड़ जुटाई जा सकती है, उसे कैमरे के सामने खूबसूरती
से दिखाया भी जा सकता है। मुश्किल जगह संसद है। वहाँ सामने राहुल गांधी बैठे हैं और
उनके पास वे परेशान करने वाली चीज़ें हैं जिन्हें सवाल कहा जाता है।
छात्र
आंदोलन ने इन सवालों से बचना और मुश्किल कर दिया। प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ हिंसा
और राजनीतिक संरक्षण के दावों पर सीधी प्रतिक्रिया जाँच और पारदर्शिता होनी चाहिए थी।
इसके बजाय विवाद बढ़ता गया और राहुल सवाल उठाते रहे। शायद रणनीति यह थी कि राहुल को
नज़रअंदाज़ करोगे तो राहुल गायब हो जाएँगे। यह रणनीति भी लगभग उतनी ही सफल दिखाई देती
है जितनी “पप्पू” वाली रणनीति।
अब
किरेन रिजिजू कह रहे हैं कि अमित शाह राहुल के सवालों का जवाब देने के लिए तैयार हैं।
बहुत अच्छी बात है देर आए, दुरुस्त आए। लेकिन इतना इंतज़ार कराने के बाद शाह शायद यह
पाएँ कि जवाब पर कितनी भी चीनी डाल दी जाए, ज़रूरी नहीं कि देश उसे निगल ही ले। अगर
आरोप झूठे हैं, तो संसद में आइए, सबूत रखिए और राहुल के आरोपों को वहीं ध्वस्त कर दीजिए।
आख़िर देश के गृह मंत्री को उन सवालों के जवाब तैयार करने के लिए हफ़्तों की ज़रूरत
क्यों होनी चाहिए जिनके बारे में सरकार कहती है कि छिपाने के लिए कुछ है ही नहीं?
यही
समस्या चुनाव आयोग के सामने भी है। चुनावी हेरफेर जैसे गंभीर आरोपों का जवाब हमेशा
“हम पर भरोसा कीजिए” नहीं हो सकता। भरोसा कोई EVM का बटन नहीं है जिसे जनता की ओर से
कोई और दबा दे। भरोसा पारदर्शिता, सबूत और मुश्किल सवालों का सामना करने वाली संस्थाओं
से कमाया जाता है।
और
बात फिर राहुल के विमान पर आ जाती है। लखनऊ में कुछ भी संदिग्ध होने की ज़रूरत नहीं
थी, फिर भी इस घटना ने एक परेशान करने वाली सच्चाई सामने रख दी। लैंडिंग सामान्य घटना
हो सकती थी, लेकिन उससे पैदा हुआ डर सामान्य नहीं था। जब देश के नागरिक सत्ता पर इतना
अविश्वास करने लगें कि विपक्ष के नेता के विमान से जुड़ी एक साधारण घटना भी उन्हें
सबसे बुरी आशंका की ओर ले जाए, तो शायद इसका इलाज एक और रील नहीं है। शायद इसका इलाज
भरोसा वापस कमाना है।
भाजपा
ने वर्षों तक देश को समझाया कि राहुल गांधी “पप्पू” हैं। आज वही पप्पू उसके सबसे बड़े
राजनीतिक सिरदर्दों में से एक बन गया है। मोदी दोस्ताना भीड़ तलाश सकते हैं, शाह अपने
जवाब तैयार कर सकते हैं और भाजपा राहुल के लिए कोई नया नाम भी खोज सकती है, लेकिन संसद
के उस पार राहुल फिर भी खड़े होंगे हाथ में एक और सवाल लेकर।
भाजपा
चाहती थी कि देश पप्पू पर हँसे। मज़ाक ने शायद गलत मोड़ ले लिया है अब पप्पू सवाल पूछ
रहा है, और मोदी-शाह को जवाब ढूँढ़ने पड़ रहे हैं।
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