भाजपा की डराने-धमकाने की राजनीति अब उलटी पड़ रही है
भाजपा
की डराने-धमकाने की राजनीति अब उलटी पड़ रही है
कल मैंने राहुल गांधी के विमान
की लखनऊ में लैंडिंग के दौरान हुई घटना और उससे पैदा हुई चिंता पर लिखा था। अब उससे
भी अधिक गंभीर मामला सामने आया है। राहुल गांधी और कांग्रेस के 25 सांसदों को गोली
मारने की धमकी देने वाला व्यक्ति उस विवाद के बाद सामने आया, जिसमें आरोप लगाया गया
था कि कांग्रेस सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के साथ अभद्र व्यवहार किया। संसदीय
कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने इन आरोपों को सार्वजनिक रूप से आगे बढ़ाया, जबकि कांग्रेस
ने उनका स्पष्ट रूप से खंडन किया। बाद में धमकी देने वाले व्यक्ति को पुलिस ने कोटा
में हिरासत में ले लिया।
यहीं से राजनीतिक बयानबाज़ी
खतरनाक होने लगती है। एक ताकतवर मंत्री सनसनीखेज आरोप लगाता है, टीवी और सोशल मीडिया
उसे फैलाते हैं, राजनीतिक गुस्सा भड़कता है और फिर कोई निर्वाचित सांसदों को गोली मारने
की धमकी देने लगता है। धमकी देने वाला अपने शब्दों और अपने कृत्य के लिए स्वयं जिम्मेदार
है, लेकिन देश को यह भी पूछना चाहिए कि ऐसा माहौल आखिर बना कैसे?
राहुल गांधी के खिलाफ ऐसे बयानों
को लेकर भी FIR और आपराधिक शिकायतें हुई हैं, जिन्हें शिकायतकर्ताओं ने अपमानजनक या
भावनाएं आहत करने वाला बताया। बार-बार कहा गया कि नेताओं को अपने शब्दों की जिम्मेदारी
लेनी चाहिए, क्योंकि शब्दों के परिणाम होते हैं। ठीक है, तो फिर यही सिद्धांत सब पर
लागू कीजिए। यहां किसी की भावनाएं भर आहत होने की बात नहीं है; यहां विपक्ष के नेता
और दूसरे निर्वाचित सांसदों को गोली मारने की धमकी दी गई है।
मेरी राय में किरेन रिजिजू
के खिलाफ भी FIR दर्ज होनी चाहिए, ताकि उनके बयानों और उनसे जुड़ी परिस्थितियों की
जांच हो सके। यदि राजनाथ सिंह ने भी वही विवादित आरोप लगाए या दोहराए हैं, तो उनके
बयानों की भी उसी कसौटी पर जांच होनी चाहिए। FIR किसी को दोषी घोषित करना नहीं है।
जांच यह तय करे कि किसने क्या कहा, उसके पास क्या सबूत थे, धमकी देने वाले व्यक्ति
ने क्या देखा या सुना और क्या किसी कानून का उल्लंघन हुआ।
शायद यही कारण है कि भाजपा
की पुरानी डराने-धमकाने वाली राजनीति अब अपनी ताकत खो रही है। डर तभी तक काम करता है,
जब तक लोग डरते हैं। जब धमकियां देने वाले लोग पुलिस की हिरासत में पहुंचने लगते हैं,
तब अफसरों, पुलिसकर्मियों और व्यवस्था के दूसरे लोगों को भी समझ आने लगता है कि राजनीतिक
सत्ता स्थायी नहीं होती और एक दिन हर किसी से उसके किए का हिसाब पूछा जा सकता है।
उधर राहुल गांधी सवाल पूछना
बंद नहीं कर रहे। भाजपा ने वर्षों और बेहिसाब राजनीतिक ताकत लगाकर उन्हें “पप्पू” के
रूप में बेचने की कोशिश की। अब वही “पप्पू” विपक्ष का नेता है, सरकार से लगातार सवाल
पूछ रहा है और गायब होने को तैयार नहीं है। जब सवाल मुश्किल होने लगते हैं, तो किसी
न किसी तरह राहुल गांधी को लेकर एक नया विवाद पैदा हो जाता है। अब कहा जा रहा है कि
कांग्रेस सांसदों ने स्पीकर का अपमान किया। अगर ऐसा हुआ है तो सबूत दिखाइए और कार्रवाई
कीजिए। अगर नहीं हुआ, तो आरोप फैलाने वालों से भी जवाब मांगिए।
लोकतंत्र एक कानून सत्ता में
बैठे लोगों के लिए और दूसरा उनसे सवाल पूछने वालों के लिए रखकर नहीं चल सकता। अगर राहुल
गांधी के शब्दों पर इसलिए FIR हो सकती है कि किसी को अपमान महसूस हुआ, तो राहुल गांधी
और 25 सांसदों को गोली मारने की धमकी के आसपास पैदा हुई राजनीतिक बयानबाज़ी की जांच
तो निश्चित रूप से होनी चाहिए।
डर की राजनीति की सबसे बड़ी
कमजोरी यही है कि जिस दिन लोग डरना बंद कर देते हैं, उसी दिन उसका खेल खत्म होने लगता
है। भाजपा ने वर्षों राहुल गांधी को “पप्पू” बनाने में लगाए। अब वही “पप्पू” सवाल पूछ
रहा है, धमकी देने वाले पुलिस के पास पहुंच रहे हैं और पुरानी स्क्रिप्ट अचानक उतनी
डरावनी नहीं दिखाई दे रही। एक संविधान, एक कानून और एक ही पैमाना सबके लिए।
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