जब गुंडे “सनातन योद्धा” बन जाएँ, तो क्या वह सनातन रह जाता है?
जब
गुंडे “सनातन योद्धा” बन जाएँ, तो क्या वह सनातन रह जाता है?
मैंने सनातन को हमेशा धर्म,
करुणा, सत्य और न्याय की परंपरा के रूप में माना है। लेकिन आज मैं एक ऐसा सवाल पूछने
पर मजबूर हूँ जिसकी कभी कल्पना भी नहीं की थी क्या हमें सनातन को उन लोगों से वापस
लेना होगा जिन्होंने राजनीतिक रूप से उस पर कब्ज़ा कर लिया है, या फिर सभ्य लोगों को
इनके बनाए हुए सनातन को ही छोड़ देना चाहिए? मैं इनके सनातन को अपना सनातन मानने से
इनकार करता हूँ।
सनातन का अर्थ अपने पिता के
लिए न्याय माँग रही 14 साल की बच्ची को धमकाना नहीं हो सकता। दलितों, अल्पसंख्यकों,
छात्रों या अपने से कमज़ोर किसी व्यक्ति को डराकर फिर धार्मिक नारे लगाना धर्म नहीं
हो सकता। धर्म की बात करने वाली परंपरा गुंडागर्दी का लाइसेंस सिर्फ इसलिए नहीं बन
सकती कि गुंडे के हाथ में सही राजनीतिक झंडा है।
बिलकिस बानो का मामला देखिए।
बिलकिस बानो के सामूहिक बलात्कार और उनके परिवार के सदस्यों की हत्या के दोषी ग्यारह
लोगों को गुजरात सरकार ने समय से पहले रिहा कर दिया। कुछ लोगों ने उनकी रिहाई का सार्वजनिक
रूप से जश्न भी मनाया, लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट ने उस रिहाई को रद्द करके उन्हें
वापस जेल भेज दिया। मेरा सवाल बहुत छोटा है सनातन का कौन-सा सिद्धांत ऐसे अपराधों के
दोषियों का स्वागत और सम्मान करना सिखाता है?
अब स्वतंत्र भारद्वाज से जुड़े
विवाद को देखिए। छात्र कार्यकर्ता निशु आज़ाद के पिता के खिलाफ हिंसा के मामले में
उन पर आरोप लगे हैं, जबकि निशु ने अलग से बलात्कार की धमकियों की शिकायत की है। आरोपों
की जाँच हो और जो दोषी हो उसे कानून के अनुसार सज़ा मिले। लेकिन धमकी, हिंसा और दहशत
को सनातन की रक्षा मत कहिए। धार्मिक नारा लगाने से कोई अपराधी धर्मयोद्धा नहीं बन जाता।
फिर आते हैं टेलीविज़न पर बैठे
सनातन के स्वयंभू ठेकेदार। गोदी मीडिया के एंकर रात-दिन “सनातन बचाने” के नाम पर चीखते
हैं और धर्म को किसी दूसरे समुदाय के खिलाफ हथियार बना देते हैं। सनातन को बचाने के
लिए किसी चीखते हुए टीवी एंकर की जरूरत नहीं है। करुणा रखिए, सत्य बोलिए, कमज़ोर की
रक्षा कीजिए और धर्म का पालन कीजिए। दुनिया अपने-आप समझ जाएगी कि सनातन क्या है।
यही सवाल मंदिरों से भी पूछा
जाना चाहिए। मंदिर वह स्थान होना चाहिए जहाँ एक साधारण इंसान कुछ मिनटों के लिए बिना
भय, हैसियत और विशेषाधिकार के भगवान के सामने खड़ा हो सके। लेकिन जब पूजा भी फीस, वीआईपी
लाइन और पैसे वालों के लिए विशेष दर्शन में बँट जाए, तो सवाल पूछना पड़ेगा हम सनातन
चला रहे हैं या भगवान के नाम पर एक और व्यवसाय?
यही राजनीतिक सनातन का सबसे
बड़ा खतरा है। मंदिर राजनीतिक मंच बन जाते हैं, धर्म चुनावी हथियार बन जाता है और हिंसा
या धमकी के आरोपों से घिरे लोग अचानक हिंदू धर्म के “योद्धा” बन जाते हैं। लगता है
आज नियम बहुत आसान है जितनी ज़ोर से “सनातन” चिल्लाओ, उतना ही कम कोई पूछेगा कि तुम्हारे
कर्मों का सनातन से कोई लेना-देना भी है या नहीं।
शायद सनातन के वास्तविक सिद्धांतों
में विश्वास रखने वाले लोग बहुत लंबे समय तक चुप रहे। हमने नेताओं, संगठनों, टीवी स्टूडियो
और सड़क के गुंडों को अपने धर्म की परिभाषा लिखने दी। जब कोई अधर्म करते हुए
खुद को सनातन का रक्षक बताता है और अच्छे लोग चुप रहते हैं, तो नकली सनातन थोड़ा और
ताकतवर हो जाता है।
इसलिए अब शायद चुनाव साफ है
सनातन वापस लो, या इनका सनातन छोड़ दो। सनातन वापस लेने का अर्थ है यह कहना कि अपराधी
अपराधी ही रहेगा, चाहे वह कितनी बार जय श्री राम क्यों न चिल्लाए। इसका अर्थ
है 14 साल की बच्ची के साथ खड़ा होना, चाहे आरोपी किसी भी ताकतवर व्यक्ति से अपने संबंधों
का दावा करे। और बिलकिस बानो जैसी पीड़िता के साथ खड़ा होना, क्योंकि धर्म पीड़ित के
लिए न्याय माँगता है, सत्ता के सामने वफादारी नहीं।
इसका अर्थ यह भी है कि
RSS, BJP, कांग्रेस या किसी अन्य राजनीतिक संगठन को यह अधिकार न दिया जाए कि वह तय
करे सनातन क्या है। सनातन आज की राजनीतिक पार्टियों से बहुत पहले था और आज के नेताओं
के भुला दिए जाने के बहुत बाद भी रहेगा। किसी पार्टी की सनातन पर मिल्कियत नहीं है,
किसी संगठन के पास हिंदू धर्म का कॉपीराइट नहीं है और किसी नेता को यह प्रमाणपत्र बाँटने
का अधिकार नहीं है कि कौन कितना हिंदू है।
अगर सनातन का अर्थ करुणा, न्याय,
सत्य और कमज़ोर की रक्षा है, तो उसे वापस लीजिए। लेकिन अगर नफरत, धमकी, गुंडागर्दी
और राजनीतिक हिंसा को ही सनातन का नया चेहरा बनने दिया जाएगा, तो सभ्य लोगों में इतना
साहस होना चाहिए कि वे साफ कह सकें अपना राजनीतिक सनातन अपने पास रखो, यह मेरा सनातन
नहीं है।
या तो सनातन को गुंडों से वापस
लो, या गुंडों को अपनी गुंडागर्दी का नाम सनातन देना बंद करवाओ। क्योंकि जिस दिन अधर्म,
धर्म का झंडा लेकर मार्च करने लगे, उस दिन चुप्पी तटस्थता नहीं रहती वह समर्पण बन जाती
है।
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