जब ध्यान भटकाने की राजनीति काम करना बंद कर दे: एक ट्रॉफी भी मोदी-शाह को नहीं बचा सकती

 

जब ध्यान भटकाने की राजनीति काम करना बंद कर दे: एक ट्रॉफी भी मोदी-शाह को नहीं बचा सकती

English Version: https://rakeshinsightfulgaze.blogspot.com/2026/09/when-trophy-becomes-more-important-than.html

एक बार फिर क्रिकेट को राजनीति में घसीट दिया गया। भारतीय महिला टीम की चैंपियनशिप जीत का जश्न मनाने के बजाय चर्चा इस बात पर केंद्रित हो गई कि टीम ने PCB प्रमुख से ट्रॉफी क्यों नहीं ली। अचानक ट्रॉफी खबर बन गई और देश के लिए चैंपियनशिप जीतने वाली बेटियाँ पीछे छूट गईं।

शायद किसी और समय यह राजनीतिक ध्यान भटकाने का सफल तरीका होता। लेकिन आज मोदी और शाह के सामने एक बड़ी समस्या है असहज करने वाली खबरें इतनी ज्यादा हैं कि हर बार एक नई खबर बनाकर पुरानी खबरों को दबाना आसान नहीं रहा।

शुरुआत संसद से कीजिए। हाल के संसद सत्र के अधिकांश समय मोदी और शाह की गैर-मौजूदगी चर्चा का विषय रही, जबकि राहुल गांधी और विपक्ष लगातार असहज सवाल उठाते रहे। भाजपा ने वर्षों तक राहुल को “पप्पू” साबित करने में अपनी राजनीतिक ताकत और भारी संसाधन लगाए। अब वही राहुल लगातार राजनीतिक बहस की दिशा तय कर रहे हैं, जबकि मोदी और शाह संसद के भीतर उस सीधे टकराव से बचते दिखाई देते हैं जिसकी चुनौती राहुल बार-बार देते हैं। यह तस्वीर किसी पाकिस्तानी अधिकारी से ट्रॉफी लेने या न लेने से कहीं ज्यादा राजनीतिक नुकसान पहुंचा सकती है।

अब भाजपा के भीतर से आती परेशानियों को देखिए। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री का इस्तीफा एक और सिरदर्द बन गया है। मोदी द्वारा मंत्रिमंडल में फेरबदल की कोशिशों को लेकर भाजपा मंत्रियों के कथित विरोध और राजनीतिक अटकलें उससे भी बड़ा सवाल खड़ा करती हैं क्या मोदी की वह कमांड-एंड-कंट्रोल वाली पकड़ कमजोर पड़ने लगी है? जिस नेता को कभी राजनीतिक रूप से अजेय दिखाया जाता था, उसके लिए यह धारणा भी नुकसानदेह है कि अब अपनी ही सरकार के लोगों को इधर से उधर करना आसान नहीं रहा।

संसद के बाहर छात्रों का दबाव लगातार बढ़ रहा है। पेपर लीक, शिक्षा व्यवस्था, बेरोजगारी और सरकारी जवाबदेही जैसे सवाल अब राष्ट्रीय बहस में जगह बना रहे हैं। इंदौर में राहुल गांधी की छात्र रैली को रोकने या उसमें बाधा डालने की कोशिशों ने उल्टा उसे और अधिक चर्चा में ला दिया, जबकि बड़ी संख्या में छात्रों द्वारा रैली की अनुमति के समर्थन की खबरें सामने आईं। जब किसी रैली को रोकना, उसे होने देने से बड़ी खबर बन जाए, तो राजनीतिक प्रबंधन कहीं न कहीं उल्टा पड़ चुका होता है।

चुनावी परेशानियां भी कम नहीं हैं। कुछ उपचुनावों में भाजपा को लगे झटके और पश्चिम बंगाल में उसकी राजनीतिक रणनीति की मुश्किलों ने उस अजेय चुनावी मशीन की छवि को चुनौती दी है जिसे वर्षों से देश के सामने पेश किया गया। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी हर घटना अब वह शानदार तस्वीर नहीं दे रही जिसे कभी मोदी की राजनीतिक मशीनरी बड़ी आसानी से “विश्वगुरु” वाली उपलब्धि में बदल देती थी।

और इसी माहौल में क्रिकेट की ट्रॉफी वाली कहानी अचानक राजनीतिक रूप से बहुत सुविधाजनक लगने लगती है। पाकिस्तान की बात कीजिए। देशभक्ति की बात कीजिए। ट्रॉफी की बात कीजिए। बस संसद, छात्र आंदोलन, पेपर लीक, बेरोजगारी, गिरती इमारतों, चुनावी झटकों और भाजपा के भीतर संभावित असंतोष पर ज्यादा देर बात मत कीजिए।

लेकिन यहां एक विरोधाभास भी है। अगर किसी पाकिस्तानी क्रिकेट अधिकारी से ट्रॉफी लेना इतना आपत्तिजनक है, तो पाकिस्तान से जुड़े व्यापारिक रिश्ते रखने वाले भारतीय कारोबारियों के लिए यही पैमाना क्यों नहीं होना चाहिए? क्या एक युवा महिला खिलाड़ी के हाथ में ट्रॉफी आते ही देशभक्ति का पैमाना बदल जाता है, लेकिन बड़े व्यापारिक सौदों के समय वही देशभक्ति छुट्टी पर चली जाती है?

इस पूरे तमाशे में सबसे बड़ा नुकसान उस असली उपलब्धि का हुआ जिसे देश को मनाना चाहिए था। भारत की बेटियों ने चैंपियनशिप जीती थी। खबर उन्हें होना चाहिए था। लेकिन राजनीति और टीवी बहसों ने उनकी खेल उपलब्धि को भी राष्ट्रवाद के एक और तमाशे में बदल दिया।

पुराना फार्मूला बहुत आसान था। जब मुश्किल सवाल सामने आएं, उनसे भी ज्यादा शोर करने वाली कोई नई खबर पैदा कर दीजिए। पाकिस्तान, धर्म, राष्ट्रवाद या कोई नया विवाद कुछ न कुछ काम आ ही जाता था।

लेकिन अब कुछ बदलता दिखाई दे रहा है। छात्र सवाल पूछ रहे हैं। राहुल गांधी लगातार हमला कर रहे हैं। राजनीतिक झटके खत्म नहीं हो रहे। संसद खुद असहज जगह बनती दिखाई दे रही है। भाजपा के अंदर की खींचतान पर भी अब खुलेआम चर्चा होने लगी है। CJP जैसे आंदोलन शिक्षा और जवाबदेही के सवालों को जिंदा रखने की कोशिश कर रहे हैं ताकि हर नया विवाद कल के अनुत्तरित सवालों को दफन न कर सके।

मोदी और शाह को शायद इस समय एक अच्छी खबर की सख्त जरूरत है। ट्रॉफी ने उन्हें एक खबर दे भी दी।

मुश्किल यह है कि इस बार उस एक अच्छी खबर के पीछे बहुत सारी बुरी खबरें खड़ी हैं। ध्यान भटकाने की राजनीति तभी तक काम करती है, जब तक जनता अपना ध्यान भटकने देने को तैयार हो।

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