भारत को कौन चला रहा है और उन पर नज़र कौन रख रहा है?
भारत को कौन चला रहा है और उन पर नज़र कौन रख रहा है?
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भारत
में 140 करोड़ से अधिक लोग
रहते हैं, लेकिन जब
सत्ता से सवाल पूछने
वाली संस्थाओं पर ही सवाल
उठने लगें, तो सत्ता में
बैठे लोगों को जवाबदेह कौन
ठहराएगा?
मीडिया
का काम सरकार से
सवाल पूछना है, उसका प्रचार
विभाग बनना नहीं। चुनाव
आयोग का काम जनता
के वोट की रक्षा
करना है, न कि
अपनी निष्पक्षता पर ही सवाल
खड़े होने देना। न्यायपालिका
का काम न्याय देना
है, न कि जनता
को यह सोचने पर
मजबूर करना कि क्या
ताकतवर लोगों के लिए कानून
अलग है।
पुलिस
का काम ऊपर से
आदेश आने का इंतज़ार
किए बिना एफआईआर दर्ज
करना है। अपराध, अपराध
होता है, चाहे उसे
कोई भी करे। पुलिस
का काम शिकायत दर्ज
करना, जाँच करना और
मामला न्यायपालिका के सामने पेश
करना है। फिर किसी
की शिकायत दर्ज होगी या
नहीं, यह उसके राजनीतिक
संबंधों पर क्यों निर्भर
करे?
और
जब छात्र निष्पक्ष परीक्षाओं, शिक्षकों और ठीक से
चलने वाले स्कूलों की
माँग करते हैं, तो
उनके सवालों का जवाब देने
के बजाय उन पर
पुलिस कार्रवाई क्यों की जाए?
अगर
मीडिया सत्ता से सवाल नहीं
पूछ सकता, पुलिस स्वतंत्र होकर काम नहीं
कर सकती, चुनाव आयोग जनता का
विश्वास नहीं जीत सकता
और न्यायपालिका सबके लिए समान
न्याय सुनिश्चित नहीं कर सकती,
तो आखिर जनता की
रक्षा कौन करेगा?
भारत
को एक और टीवी
बहस की ज़रूरत नहीं
है कि देश से
ज़्यादा प्यार कौन करता है।
भारत को ऐसी संस्थाओं
की ज़रूरत है जो संविधान
के प्रति जवाबदेह हों, किसी राजनीतिक
दल के प्रति नहीं।
कोई
सरकार चुनाव जीत सकती है,
लेकिन सवालों से बचने का
अधिकार नहीं जीत सकती।
आगे
का रास्ता
आंदोलन
शुरू हो चुका है
और सवालों की आवाज़ लगातार
तेज़ हो रही है।
छात्र अपनी शिक्षा और
अपने भविष्य को लेकर जवाब
माँग रहे हैं। नागरिक
चुनाव आयोग, पुलिस और न्यायपालिका की
स्वतंत्रता पर सवाल उठा
रहे हैं। इन चिंताओं
का जवाब एक और
राजनीतिक भाषण नहीं हो
सकता।
समाधान
है चुनाव आयोग की स्वतंत्र
जाँच-पड़ताल, चुनावी रिकॉर्ड में पारदर्शिता, निष्पक्ष
चुनाव और छात्रों तथा
नागरिकों को बिना किसी
डर या धमकी के
शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करने का अधिकार।
पुलिस का काम इस
अधिकार की रक्षा करना
है, न कि राजनीतिक
आदेशों पर काम करना।
असली
कसौटी यही है कि
क्या ये संस्थाएँ किसी
राजनीतिक दल के बजाय
संविधान के प्रति जवाबदेह
रह सकती हैं। अगर
सरकार जनता का विश्वास
खो चुकी है, तो
जनता के पास शांतिपूर्ण
भागीदारी और अपने वोट
के माध्यम से उसे जवाबदेह
ठहराने के लोकतांत्रिक रास्ते
मौजूद हैं।
भारत
किसी सरकार की जागीर नहीं
है। उसकी संस्थाएँ किसी
राजनीतिक दल की निजी
संपत्ति नहीं हैं। जनता
को जवाब माँगने का
अधिकार है और यह
तय करने की ताकत
भी कि देश पर
शासन कौन करेगा।
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