क्या ज्ञानेश कुमार की जान ख़तरे में है? क्या दूसरे चुनाव आयुक्तों को भी ख़तरे में डाल दिया गया है?
क्या ज्ञानेश कुमार की जान ख़तरे में है? क्या दूसरे चुनाव आयुक्तों को भी ख़तरे में डाल दिया गया है?
क्या
ज्ञानेश कुमार को इस बात
का एहसास है कि शायद
अब वे एक ऐसे
जाल में फँस चुके
हैं, जहाँ उनके लिए
कोई भी रास्ता सुरक्षित
दिखाई नहीं देता? और
क्या दूसरे दो चुनाव आयुक्त
भी उस जानकारी के
कारण ख़तरे की स्थिति में
आ गए हैं, जो
शायद उनके पास हो
सकती है? यही बात
मुझे सबसे अधिक चिंतित
करती है। मेरी चिंता
एक साधारण से सवाल से
पैदा होती है: क्या
होता है जब ताक़तवर
राजनीतिक नेताओं के क़रीब काम
करने वाले लोग अचानक
ऐसी जानकारी रखने लगते हैं,
जो उन्हीं नेताओं के लिए मुश्किलें
पैदा कर सकती है?
उस समय वे केवल
सिस्टम के अंदर काम
आने वाले लोग नहीं
रह जाते, बल्कि वे इस बात
के गवाह भी बन
सकते हैं कि वह
सिस्टम वास्तव में कैसे काम
करता था। इसीलिए मेरा
मानना है कि ज्ञानेश
कुमार और दूसरे चुनाव
आयुक्तों की सुरक्षा अब
सार्वजनिक चिंता का विषय बननी
चाहिए।
भारत
पहले भी राजनीतिक रूप
से संवेदनशील मामलों से जुड़े लोगों
को लेकर विवाद देख
चुका है। जज बी.
एच. लोया की मृत्यु
के बाद गंभीर आरोप
लगे और स्वतंत्र जाँच
की माँग उठी, क्योंकि
वे सोहराबुद्दीन शेख़ मामले की
सुनवाई कर रहे थे,
जिसमें अमित शाह पहले
आरोपी रह चुके थे।
बाद में सुप्रीम कोर्ट
ने स्वतंत्र जाँच की माँग
करने वाली याचिकाएँ ख़ारिज
कर दीं और उन
दस्तावेज़ों को स्वीकार किया,
जिनके अनुसार जज लोया की
मृत्यु प्राकृतिक कारणों से हुई थी।
इसलिए उनकी मृत्यु को
लेकर लगाए गए आरोपों
को स्थापित तथ्य के रूप
में प्रस्तुत नहीं किया जाना
चाहिए। लेकिन मैं यहाँ एक
बड़ा सवाल उठा रहा
हूँ: क्या होता है
जब किसी महत्वपूर्ण संस्था
के अंदर बैठा कोई
व्यक्ति ऐसी जानकारी रखता
हो, जो बेहद ताक़तवर
लोगों के लिए ख़तरा
बन सकती हो?
चुनाव
आयोग के अंदर मतभेदों
की हाल की ख़बरें
इस सवाल को और
महत्वपूर्ण बना देती हैं।
रिपोर्टों के अनुसार, चुनाव
आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और
विवेक जोशी ने मतदाता
सूचियों के Special Intensive
Revision से जुड़े कुछ फ़ैसलों पर
लिखित आपत्तियाँ उठाई थीं। चुनाव
आयोग ने गंभीर आंतरिक
मतभेद की बात से
इनकार किया है और
कहा है कि उसके
फ़ैसले सर्वसम्मति से लिए गए।
लेकिन अगर मतभेद हुए
थे और उन मतभेदों
का कोई लिखित रिकॉर्ड
मौजूद है, तो उन
रिकॉर्ड्स को सुरक्षित रखना
बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है।
राहुल
गांधी ने अब सार्वजनिक
रूप से ज्ञानेश कुमार
से “सरकारी गवाह” बनने की बात
कही है। उन्होंने यह
आरोप भी लगाया है
कि सिस्टम के अंदर से
जानकारी बाहर आ रही
है। ये राहुल गांधी
के आरोप हैं, स्थापित
तथ्य नहीं, लेकिन इनसे एक स्वाभाविक
सवाल पैदा होता है:
सिस्टम के अंदर कौन
बोल रहा है, उसके
पास क्या जानकारी है,
और आख़िरकार क्या-क्या सामने
आ सकता है? शायद
इन संस्थाओं के अंदर बैठे
कुछ लोगों को अब यह
समझ आने लगा है
कि सरकारें बदल जाती हैं,
लेकिन दस्तावेज़, कंप्यूटर रिकॉर्ड, ईमेल, निर्देश, चुनावी आँकड़े और गवाह पीछे
रह जाते हैं।
अगर
भविष्य में सबूतों से
गंभीर चुनावी गड़बड़ी साबित होती है, तो
उसके परिणाम केवल राजनीतिक नहीं
होंगे। जाँच एजेंसियों को
यह पता लगाना होगा
कि निर्देश किसने दिए, उन्हें लागू
किसने किया, किसे इसकी जानकारी
थी और इससे फ़ायदा
किसे हुआ। ऐसी स्थिति
ज्ञानेश कुमार को एक बेहद
असाधारण जगह पर खड़ा
कर सकती है। अगर
उनके पास महत्वपूर्ण जानकारी
है और वे चुप
रहते हैं, तो उनकी
अपनी ज़िम्मेदारी पर भी सवाल
उठ सकते हैं। अगर
वे बोलते हैं, तो उनकी
गवाही उनसे कहीं अधिक
ताक़तवर लोगों को मुश्किल में
डाल सकती है। और
अगर वे ख़ुद को
और दूसरों को एक साथ
बचाने की कोशिश करते
हैं, तो एक समय
ऐसा भी आ सकता
है जब दोनों तरफ़
के लोग उन पर
भरोसा करना बंद कर
दें। मैं इसी जाल
की बात कर रहा
हूँ।
इसीलिए
ज्ञानेश कुमार का अपना भविष्य
भी शायद इस बात
पर निर्भर करता है कि
पूरा सच सामने आए।
अगर उनके पास किसी
ग़लत काम के सबूत
हैं, तो उन सबूतों
के लिए सबसे सुरक्षित
जगह उनका दिमाग़ या
कोई ऐसी छिपी हुई
जगह नहीं होनी चाहिए,
जहाँ से वे ग़ायब
किए जा सकें। उन्हें
किसी स्वतंत्र प्राधिकरण के सामने औपचारिक
रूप से दर्ज कराया
जाना चाहिए, क़ानून के अनुसार उनकी
सुरक्षा होनी चाहिए और
उन्हें सुरक्षित तरीके से संरक्षित किया
जाना चाहिए। यही सिद्धांत दूसरे
चुनाव आयुक्तों और चुनाव आयोग
के उन सभी अधिकारियों
पर भी लागू होना
चाहिए, जिनके पास इस मामले
से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी या सबूत हो
सकते हैं।
भारत
को सबूतों और उन्हें रखने
वाले लोगों की सुरक्षा के
लिए किसी घटना के
होने का इंतज़ार नहीं
करना चाहिए। चुनाव आयोग के आचरण
से जुड़े विश्वसनीय आरोपों की स्वतंत्र जाँच
होनी चाहिए। संबंधित इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड, संचार, चुनावी आँकड़े, निर्देश और दूसरे संभावित
सबूत तुरंत सुरक्षित किए जाने चाहिए,
ताकि पूरे तथ्य की
स्वतंत्र रूप से जाँच
की जा सके। ज्ञानेश
कुमार और दूसरे चुनाव
आयुक्तों से भी ऐसी
परिस्थितियों में पूछताछ होनी
चाहिए, जहाँ न सरकार
जाँच में हस्तक्षेप कर
सके और न विपक्ष।
अगर
जाँच में यह सबूत
मिलता है कि ज्ञानेश
कुमार ने स्वयं कोई
आपराधिक कृत्य किया है, तो
उन्हें भी किसी दूसरे
नागरिक की तरह क़ानूनी
प्रक्रिया का सामना करना
चाहिए। लेकिन मुक़दमा चलाना और सुरक्षा देना
दो अलग-अलग सवाल
हैं। अगर उन्होंने अपराध
किया है, तो उनकी
जाँच कीजिए। अगर उनके पास
दूसरों के ख़िलाफ़ सबूत
हैं, तो उनकी सुरक्षा
कीजिए। और अगर वे
किसी मामले में भागीदार भी
रहे हैं और गवाह
भी हैं, तो भारत
को उनसे पूरी कहानी
जानने की ज़रूरत है।
उन्हें पद से हटाना,
गिरफ़्तार करना या उन
पर मुक़दमा चलाना केवल राजनीतिक माँगों
के आधार पर नहीं,
बल्कि सबूत और क़ानूनी
प्रक्रिया के आधार पर
होना चाहिए।
उद्देश्य
केवल ज्ञानेश कुमार को जेल में
डालना नहीं होना चाहिए।
उद्देश्य यह पता लगाना
होना चाहिए कि क्या वास्तव
में कोई ग़लत काम
हुआ और अगर हुआ,
तो उसके पीछे कौन
था। भारत को यह
जानने की ज़रूरत है
कि निर्देश किसने दिए, उन्हें लागू
किसने किया, किसे इसकी जानकारी
थी, फ़ायदा किसे हुआ और
आदेशों की यह कड़ी
आख़िर कहाँ तक जाती
थी। अगर ज्ञानेश कुमार
इन सवालों के जवाब जानते
हैं, तो उन्हें तुरंत
जेल की सलाखों के
पीछे डालने से कहीं अधिक
महत्वपूर्ण उनकी जान की
सुरक्षा करना, सबूतों को सुरक्षित रखना
और उनकी पूरी गवाही
दर्ज करना हो सकता
है।
यही
सुरक्षा दूसरे चुनाव आयुक्तों और उन सभी
अधिकारियों को भी मिलनी
चाहिए, जो सबूत देने
के लिए तैयार हों।
अब यह मामला केवल
ज्ञानेश कुमार का नहीं है।
यह गवाहों की सुरक्षा, सबूतों
को बचाने और सच तक
पहुँचने का सवाल है।
अगर महत्वपूर्ण जानकारी रखने वाले किसी
व्यक्ति के साथ उस
जानकारी को स्वतंत्र रूप
से दर्ज किए जाने
से पहले कुछ हो
जाता है, तो भारत
केवल एक गवाह नहीं
खोएगा; हो सकता है
कि वह उस सच
को ही खो दे,
जिसे सामने लाना सबसे ज़रूरी
था।
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