भारत में आंदोलन अब केवल छात्रों का आंदोलन नहीं रहा
भारत में आंदोलन अब केवल छात्रों का आंदोलन नहीं रहा
भारत में जो कुछ हो रहा है सरकार के खिलाफ एक आंदोलन वह अब रुकने वाला नहीं है। 2012 में अन्ना हज़ारे ने भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाया था और लोगों ने उस पर विश्वास किया, जिसके कारण कांग्रेस सरकार के पतन की शुरुआत हुई। पिछले 12 वर्षों में किसी पर आरोप साबित नहीं हुए। इसका मतलब यह नहीं है कि भ्रष्टाचार नहीं हुआ था; इसका सीधा मतलब यह हो सकता है कि ठेके उचित प्रक्रियाओं के माध्यम से दिए गए थे और संभव है कि वे कुछ चुने हुए व्यवसायों को दिए गए हों, जिनके बारे में सरकार को लगा हो कि वे उन परियोजनाओं को बेहतर तरीके से पूरा कर सकते हैं।
भाजपा ने जो किया है, उसने भ्रष्टाचार को एक ऐसे नए स्तर पर पहुँचा दिया है, जैसा भारत के इतिहास में पहले कभी नहीं देखा गया। उनके कार्यों के कारण लोगों ने आत्महत्या की, लेकिन सरकार ने इस भ्रष्टाचार की जिम्मेदारी लेने से इनकार कर दिया। सत्ता में बने रहने के लिए सरकार ने चुनाव चुराने के लिए हर हथियार का इस्तेमाल किया, जिसके लिए व्यवस्था को उन व्यवसायों के हाथों में देना जरूरी था, जो बाद में उसी व्यवस्था को मोदी और शाह के लिए खरीदने में मदद कर सकें।
मोदी और शाह की भ्रष्ट नीयत और भ्रष्टाचार पर पड़ा पर्दा अब उठ चुका है, और यह छात्र आंदोलन अब केवल छात्रों का आंदोलन नहीं रहा; बल्कि यह पूरे देश का आंदोलन बनता जा रहा है, जो मोदी और शाह के इस्तीफे के बिना खत्म होने वाला नहीं है। ज्ञानेश इस्तीफा दे सकते हैं, लेकिन मेरा मानना है कि सीमा खन्ना और टीसीएस से शुरू होने वाली यह जाँच आखिरकार मोदी और शाह तक पहुँचेगी, जो दोनों के लिए बुरी खबर है।
बहुत से लोग भूल चुके हैं कि जब न्यायपालिका ने श्रीमती गांधी पर शिकंजा कसा था, तब क्या हुआ था। इसलिए मेरा आज भी मानना है कि चाहे कितने भी भ्रष्ट जज क्यों न हों, अभी भी कुछ ऐसे जज मौजूद हैं जो मोदी और शाह से जुड़े इन कथित अपराधों की तह तक जाने में बहुत बड़ा अंतर पैदा कर सकते हैं। इस पूरे मामले में हमें अडानी और अंबानी की सीधी भूमिका भी देखने को मिल सकती है, जो शायद यह समझा सके कि सत्ता खरीदने के लिए पैसे का इस्तेमाल क्यों किया जाता है। क्या यह काम करेगा? मुझे नहीं मालूम।
सरकार के खिलाफ देश का गुस्सा अब हर तरफ से सामने आ रहा है। मोदी और शाह दोनों ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ सख्ती का रास्ता चुना है, और आरोप लगाए जा रहे हैं कि आरएसएस से जुड़े लोगों को पुलिस व्यवस्था में शामिल किया गया है। बहुत से लोग इसे उनकी आखिरी कोशिश के रूप में देख रहे हैं। यहाँ तक कि वह मीडिया, जो कभी केवल सरकार के गीत गाता था, उसमें भी अब दरारें दिखाई देने लगी हैं।
इसलिए जब हम विपक्षी दलों और सीजेपी को एक साथ देखते हैं, तो मोदी और शाह के लिए मुश्किलें साफ दिखाई देती हैं। दोनों में से किसी के पास मीडिया का सामना करने की क्षमता नहीं है, जब तक कि उन्हें ऐसा मंच न दिया जाए जहाँ वे बिना किसी चुनौती के केवल एकतरफा अपनी बात कह सकें। भारत में जो कुछ हो रहा है, जब हम उसे एक साथ जोड़कर देखते हैं, तो यह समझना आसान हो जाता है कि लोग क्यों मानने लगे हैं कि इस सरकार का पतन करीब हो सकता है। शायद यही कारण है कि मोदी और शाह छिपे हुए हैं और दूर बैठकर केवल अपने लोगों को आदेश दे रहे हैं।
एक बात और है। ऐसी खबरें और अफवाहें हैं कि भाजपा के कई सदस्य पार्टी छोड़ना चाहते हैं, लेकिन कांग्रेस शायद उन्हें स्वीकार करने के लिए तैयार न हो, क्योंकि अतीत में कई लोगों ने कांग्रेस पार्टी को धोखा दिया है। अगर मैं राहुल गांधी की जगह होता और पार्टी में नई ऊर्जा लाना चाहता, तो मैं इन छात्रों के बीच से नया खून तलाशता, जिन्होंने देश के लिए अपनी जान तक दाँव पर लगा दी है। ये छात्र पार्टी को ऐसे नेता दे सकते हैं जो देश के लिए काम करें और कम से कम शुरुआत में भ्रष्टाचार से दूर रहें।
भारत में आज जो विद्रोह हम देख रहे हैं, वह आखिरकार एक नई ऊर्जा वाली नई सरकार ला सकता है एक ऐसी सरकार जो केवल कुछ लोगों को ऊपर उठाने के बजाय हर किसी को ऊपर उठाकर भारत को आगे ले जाना चाहे, जैसा कि हमने अतीत में देखा है। हर क्रांति इतिहास पर अपनी छाप छोड़ती है। कुछ क्रांतियाँ सरकारें बदलती हैं, जबकि कुछ पूरे देश की दिशा बदल देती हैं।
आज हम जो देख रहे हैं, वह एक सरकार के खिलाफ लड़ाई से कहीं बड़ा बन सकता है। यह इस बात की लड़ाई बन सकती है कि अगली पीढ़ी किस तरह का भारत बनाना चाहती है। इतने गुस्से और उथल-पुथल के बावजूद, मुझे लगता है कि यह क्रांति भारत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ बन सकती है, और भारत के सबसे अच्छे दिन शायद अभी आने बाकी हैं।
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