क्या हमने ब्रिटिश राज से आज़ादी केवल धार्मिक शासन के सामने आत्मसमर्पण करने के लिए पाई थी?
क्या हमने ब्रिटिश राज से आज़ादी केवल धार्मिक शासन के सामने आत्मसमर्पण करने के लिए पाई थी?
जब अंग्रेज़ भारत आए, तो उन्होंने
एक ऐसा देश पाया जो अलग-अलग रियासतों, जातियों, धर्मों और समुदायों में बँटा हुआ था।
शिक्षा मुख्य रूप से विशेषाधिकार प्राप्त वर्गों तक सीमित थी, जबकि आम जनता गरीब और
अधिकतर अशिक्षित थी। धर्म, जाति, धन और शासकों का समाज पर गहरा नियंत्रण था, और आम
लोगों का अपने ही जीवन पर बहुत कम अधिकार था। अंग्रेज़ भारत को आज़ाद करने नहीं आए
थे; वे शासन करने और उसका शोषण करने आए थे, और उन्होंने भारत के अंदर मौजूद विभाजनों
का इस्तेमाल अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए भी किया। लेकिन ब्रिटिश शासन के दौरान आधुनिक
शिक्षा का भी विस्तार हुआ, जिससे विज्ञान, गणित, चिकित्सा, कानून, अर्थशास्त्र, प्रशासन
और आधुनिक शासन व्यवस्था की शिक्षा प्राप्त करने वाले भारतीयों की एक नई पीढ़ी सामने
आई। अंग्रेज़ों से लड़ने वाले बहुत से नेताओं ने इन्हीं विचारों को समझा और एक बहुत
महत्वपूर्ण बात पहचानी भारत अंग्रेज़ों से तो आज़ाद हो सकता था, लेकिन फिर भी धर्म,
जाति और सामाजिक विभाजन की अपनी ही बेड़ियों में कैद रह सकता था।
इसीलिए आज़ादी की लड़ाई केवल
अंग्रेज़ों को भारत से बाहर निकालने की लड़ाई नहीं थी। भारत के नेताओं के सामने यह
भी सवाल था कि ब्रिटिश शासन की जगह कौन-सी व्यवस्था आएगी। क्या भारत फिर ऐसी व्यवस्था
में लौटेगा जहाँ धर्म, जाति, राजा, धनवान वर्ग और प्राचीन सामाजिक नियम लोगों के अधिकार
तय करेंगे, या फिर भारत संवैधानिक कानून से चलने वाला एक आधुनिक राष्ट्र बनेगा? भारत
ने संविधान को चुना। गणराज्य की नींव न्याय, स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व, मौलिक अधिकारों,
लोकतांत्रिक चुनावों और समान नागरिकता पर रखी गई। धर्म को व्यक्ति के अधिकार के रूप
में सुरक्षा दी गई, लेकिन किसी की नागरिकता उसके धर्म पर निर्भर नहीं होनी थी।
डॉ. बी. आर. आंबेडकर शायद इस
खतरे को सबसे बेहतर समझते थे। 25 नवंबर 1949 को, संविधान अपनाए जाने से ठीक पहले, उन्होंने
सवाल उठाया कि क्या भारतीय देश को अपने पंथ से ऊपर रखेंगे या “पंथ को देश से ऊपर रखेंगे।”
उनकी चेतावनी बेहद स्पष्ट थी अगर राजनीतिक दल पंथ को देश से ऊपर रखेंगे, तो भारत की
स्वतंत्रता एक बार फिर खतरे में पड़ सकती है। उसी ऐतिहासिक भाषण में उन्होंने भारतीयों
को अपनी स्वतंत्रता किसी शक्तिशाली नेता के चरणों में समर्पित करने से भी चेताया। उन्होंने
विशेष रूप से राजनीति में भक्ति या व्यक्ति-पूजा के खतरे की बात करते हुए चेतावनी दी
कि राजनीतिक व्यक्ति-पूजा देश को “पतन और अंततः तानाशाही” की ओर ले जा सकती है।
उन चेतावनियों को एक बार फिर
पढ़िए और फिर आज के भारत को देखिए। देश से ऊपर पंथ। राजनीति में व्यक्ति-पूजा। बाहर
से लोकतंत्र का स्वरूप कायम रहना, लेकिन उसके भीतर तानाशाही का बढ़ते जाना। ये चेतावनियाँ
आज के भारत को देखने के बाद नहीं लिखी गई थीं। आंबेडकर ने हमें इन खतरों के बारे में
तब चेताया था जब गणराज्य का जन्म भी नहीं हुआ था। वे समझते थे कि केवल एक महान संविधान
लिख देना पर्याप्त नहीं है। उसी भाषण में उन्होंने कहा था कि एक अच्छा संविधान भी बुरा
साबित हो सकता है अगर उसे चलाने वाले लोग बुरे हों, क्योंकि आखिरकार संस्थाएँ उन्हीं
लोगों और राजनीतिक दलों पर निर्भर करती हैं जो उन्हें चलाते हैं।
भाजपा भी अलग-अलग दौर से गुज़री
है। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में उसने अपेक्षाकृत उदार चेहरा प्रस्तुत किया और
गठबंधन के माध्यम से सरकार चलाई। बाद में नरेंद्र मोदी राष्ट्रीय स्तर पर एक अलग संदेश
लेकर सामने आए विकास। “सबका साथ, सबका विकास” सुनने में समावेशी लगा। अन्ना हज़ारे
के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से यूपीए राजनीतिक रूप से कमजोर हुआ और लाखों भारतीय स्वच्छ
सरकार, विकास, नौकरियों, बुनियादी ढाँचे और प्रगति के वादों की ओर आकर्षित हुए। आज
भारत को पूछना चाहिए कि उन वादों का क्या हुआ और राजनीतिक संदेशों में धर्म इतना शक्तिशाली
हथियार क्यों बन गया?
यहीं पर शिक्षा, मतदान के अधिकार,
संस्थाओं, निजीकरण, असमानता और धार्मिक राजनीति को लेकर आज की लड़ाई किसी एक चुनाव
या किसी एक राजनीतिक दल से कहीं बड़ी हो जाती है। यह भारत की दो बिल्कुल अलग कल्पनाओं
के बीच की लड़ाई है। एक विचार कहता है कि भारत संविधान, समान नागरिकता, शिक्षा, विज्ञान,
तर्क, प्रमाण और सब पर समान रूप से लागू होने वाले कानूनों से चलना चाहिए। दूसरा विचार
धार्मिक पहचान, परंपरा और बहुसंख्यक राजनीतिक शक्ति को अधिक महत्व देता है। आंबेडकर
की चेतावनी हमें यही सोचने पर मजबूर करती है कि जब देश से ज्यादा महत्वपूर्ण पंथ हो
जाए, तो उसका परिणाम क्या हो सकता है।
मुझे एक विरोधाभास विशेष रूप
से पीड़ा देता है। किसी पत्थर की मूर्ति को नुकसान पहुँच जाए तो लोग गुस्से से भर उठते
हैं, लेकिन जब किसी बच्ची के साथ बलात्कार होता है, शिक्षा व्यवस्था की नाकामी से किसी
छात्र के जीवन के कई साल बर्बाद हो जाते हैं, किसी गरीब को न्याय नहीं मिलता, या किसी
नागरिक के संवैधानिक अधिकार छीन लिए जाते हैं, तो कई बार वही गुस्सा दिखाई नहीं देता।
लोग धार्मिक प्रतीकों या पशुओं की रक्षा के लिए सड़कों पर उतर सकते हैं, लेकिन किसी
इंसान की गरिमा छीने जाने पर चुप रह जाते हैं। आखिर कौन-सा धर्म हमें यह सिखाता है
कि किसी प्रतीक की रक्षा एक इंसान की रक्षा से अधिक महत्वपूर्ण है?
यह हिंदू धर्म, इस्लाम, ईसाई
धर्म, सिख धर्म, जैन धर्म, बौद्ध धर्म या किसी व्यक्ति के ईश्वर में विश्वास के खिलाफ
तर्क नहीं है। आप जिसमें चाहें विश्वास करें। जिसकी चाहें पूजा करें। मंदिर जाएँ, मस्जिद
जाएँ, चर्च जाएँ, गुरुद्वारे जाएँ, मठ जाएँ या कहीं भी न जाएँ। इसी स्वतंत्रता की रक्षा
संवैधानिक लोकतंत्र करता है। खतरा उस समय शुरू होता है जब किसी व्यक्ति या समूह की
धार्मिक मान्यता सरकार का ऐसा हथियार बन जाए जिससे यह तय किया जाने लगे कि बाकी सभी
लोगों को कैसे जीना चाहिए।
आंबेडकर का संदेश जटिल नहीं
था। केवल चुनाव होते रहने से लोकतंत्र सुरक्षित नहीं रहता। उन्होंने चेतावनी दी थी
कि लोकतंत्र अपना बाहरी स्वरूप बनाए रखते हुए भी वास्तविकता में तानाशाही को जगह दे
सकता है। उनका मानना था कि राजनीतिक लोकतंत्र उस सामाजिक लोकतंत्र के बिना जीवित नहीं
रह सकता जिसकी नींव स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व पर हो। भारत सरकार का आंबेडकर फाउंडेशन
भी उनके दर्शन को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्रों में गरिमा, एकता, स्वतंत्रता,
अधिकार और लोकतंत्र पर आधारित विचार के रूप में प्रस्तुत करता है।
इसीलिए आज भारत में शिक्षा
और मतदान के अधिकार की लड़ाई केवल छात्रों, परीक्षाओं, मतदाता सूचियों या किसी एक चुनाव
की लड़ाई नहीं है। इसकी गहराई में वही सवाल खड़ा है जो आंबेडकर ने पचहत्तर साल से भी
पहले भारत के सामने रखा था क्या भारतीय देश को पंथ से ऊपर रखेंगे, या पंथ को देश से
ऊपर?
भारत को अब तय करना है कि वह
अगली पीढ़ी के लिए कैसा देश छोड़ना चाहता है। क्या हम ऐसा भारत चाहते हैं जहाँ बच्चों
को सवाल पूछना, विज्ञान पढ़ना, गणित समझना, प्रमाणों को परखना, सत्ता से सवाल करना
और संवैधानिक कानून के तहत समान नागरिक बनकर जीना सिखाया जाए? या हम ऐसा समाज चाहते
हैं जहाँ धर्म, जाति, धन, राजनीतिक ताकत और प्राचीन सामाजिक सोच धीरे-धीरे लोगों के
अधिकार और उनके जीने का तरीका तय करने लगे?
इस चुनाव के लिए किसी को भगवान
को छोड़ने की आवश्यकता नहीं है। आवश्यकता केवल इतनी है कि हम व्यक्तिगत आस्था और सरकार
के बीच का अंतर समझें। धर्म व्यक्ति का है। संविधान हर भारतीय का है।
आंबेडकर ने गणराज्य के जन्म
से पहले ही हमें चेतावनी दे दी थी। अब हम यह नहीं कह सकते कि किसी ने हमें बताया नहीं
था कि क्या हो सकता है।
अब सवाल केवल इतना है क्या
बहुत देर हो जाने से पहले भारत उनकी चेतावनी सुनेगा?

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