भारत में बढ़ता जनविद्रोह: जनता अब जवाब माँग रही है
भारत में बढ़ता जनविद्रोह: जनता अब जवाब माँग रही है
भारत में जनविद्रोह लगातार बढ़ रहा है। खासकर तब, जब विपक्ष के बड़े नेता अपनी सुरक्षा की परवाह किए बिना जनता के बीच सड़कों पर उतर रहे हैं और सरकार से जनता के सवालों का जवाब माँग रहे हैं। यह अब किसी एक व्यक्ति का आंदोलन नहीं रह गया है। यह एक ऐसा जनआंदोलन बनता जा रहा है, जिसमें विपक्ष के नेता और आम नागरिक एक साथ खड़े होकर उन लोगों से जवाबदेही माँग रहे हैं, जो वर्षों से देश की सत्ता चला रहे हैं।
देश में बहुत से ऐसे लोग भी होंगे, जिन्होंने पहले राजनीति पर अधिक ध्यान नहीं दिया होगा, लेकिन अब वे भी इस बात को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते कि विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस ने राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के साथ कैसा व्यवहार किया। जब जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों को भी विरोध करने और सरकार से सवाल पूछने के अपने अधिकार के लिए पुलिस से जूझना पड़े, तो ज़रा सोचिए कि भारत में लोकतंत्र की क्या हालत हो चुकी है।
एक समय ऐसा भी रहा होगा, जब विपक्ष के कुछ नेता अपनी आत्मा सबसे ऊँची बोली लगाने वाले के हाथों बेचने के लिए तैयार रहे होंगे। लेकिन अब राजनीतिक परिस्थितियाँ बदल रही हैं। जो नेता एनडीए को चुनौती देना चाहते हैं, उनके लिए इंडिया गठबंधन के साथ खड़ा होना अब एक राजनीतिक आवश्यकता बन सकता है। मेरी नज़र में मोदी और शाह के नाम देश की बढ़ती आबादी के एक हिस्से के लिए राजनीतिक रूप से ज़हर बन चुके हैं। एनडीए के पास आज भी बहुमत का समर्थन है या नहीं, इसका फैसला राजनीतिक दावों से नहीं, बल्कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों से होना चाहिए।
दशकों से दक्षिण भारत की जनता और वहाँ के राजनीतिक नेतृत्व के एक बड़े हिस्से का गांधी परिवार पर विश्वास रहा है। इसका एक कारण यह भी रहा है कि कांग्रेस ने क्षेत्रीय पहचान और लोगों की भावनाओं को समझने की कोशिश की है। इनमें हिंदी थोपने का मुद्दा भी शामिल है। ये कोई छोटी-मोटी बातें नहीं हैं। ये करोड़ों भारतीयों की पहचान, संस्कृति और अधिकारों से जुड़े सवाल हैं। ये लोग एक अखंड भारत का हिस्सा बने रहना चाहते हैं, लेकिन अपनी भाषा, संस्कृति और परंपराओं की बलि देकर नहीं।
हमने ऐसे बहुत से नेता देखे हैं, जो अपनी बहादुरी के बड़े-बड़े दावे करते हैं, लेकिन जब बहादुरी दिखाने का समय आता है, तो उनकी सारी बहादुरी हवा हो जाती है। मेरी नज़र में राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने पुलिस का सामना करने और प्रदर्शनकारियों के बीच खड़े होने का साहस दिखाया है। वे ऐसे नेता नहीं हैं, जो जनता को सड़कों पर उतरने के लिए कहें और खुद बंद कमरों में सुरक्षित बैठे रहें।
और दूसरी तरफ हमारे पास एक ऐसा नेता है, जिसने कभी अपनी छप्पन इंच की छाती का ढोल पीटा था। छप्पन इंच का छोटा बंदर। अपनी ताकत और बहादुरी के बड़े-बड़े दावे करने वाला यह नेता स्वतंत्र पत्रकारों के खुले सवालों का सामना करने से भी बचता दिखाई देता है। अगर आपमें सवा अरब से अधिक लोगों के देश का नेतृत्व करने की हिम्मत है, तो फिर स्वतंत्र पत्रकारों और आम नागरिकों के सवालों का जवाब देने में इतना डर किस बात का है?
नरेंद्र मोदी ने कभी जनता के सामने जवाबदेही स्वीकार करने और अपने वादे पूरे न होने पर सज़ा भुगतने की बात कही थी। आज प्रदर्शनकारी उसी जवाबदेही की माँग कर रहे हैं। जनता के पास मोदी, अमित शाह, ज्ञानेश कुमार और मोहन भागवत से पूछने के लिए बहुत से सवाल हैं, और उन सवालों का जवाब मिलना चाहिए। जिस चौराहे की बात मोदी ने कभी की थी, वह आज जनता के खुले सवालों और शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक जवाबदेही का स्थान बनना चाहिए, न कि पुलिस की बैरिकेडिंग के पीछे छिपने का एक और बहाना।
और यहाँ एक और गंभीर सवाल खड़ा होता है। जब दिल्ली में पहले से ही लगभग एक लाख पुलिसकर्मी हैं, तो वहाँ 35,000 और सुरक्षाकर्मी तैनात करने की बात क्यों हो रही है? सरकार आखिर किस बात की तैयारी कर रही है? उसे इतनी अतिरिक्त सुरक्षा की ज़रूरत क्यों महसूस हो रही है? किसी भी अतिरिक्त तैनाती का उद्देश्य क्या है, उस पर कितना खर्च होगा और उसकी आवश्यकता क्यों है, यह सब जनता को बताया जाना चाहिए।
जिस सरकार को अपनी जनता का विश्वास प्राप्त हो, उसे जनता के सवालों से डरने की क्या ज़रूरत है? और जो नेता खुद को इतना बहादुर बताता है, उसे शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों से बचने के लिए पुलिस की बैरिकेडिंग के पीछे छिपने की क्या आवश्यकता है?
भारत की जनता अब जवाब माँग रही है। सरकार का काम उन सवालों का जवाब देना है, सवाल पूछने वालों की आवाज़ दबाना नहीं।

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