तिरंगे ने अंग्रेज़ों को हराया: क्या मोदी इसकी ताक़त कुचल सकते हैं?
तिरंगे ने अंग्रेज़ों को हराया: क्या मोदी इसकी ताक़त कुचल सकते हैं?
मोदी सरकार के चारों ओर जनाक्रोश की आग लग चुकी है, और मेरी नज़र में मोदी तथा उनके सहयोगी इस आंदोलन को अपने नियंत्रण से बाहर होने से पहले कुचलने की हताश कोशिश कर रहे हैं। भारतीय ध्वज लेकर मार्च करने वालों के विरुद्ध कार्रवाई की खबरें एक ऐसा सवाल उठाती हैं, जो हर भारतीय को परेशान करना चाहिए: क्या शांतिपूर्ण विरोध में तिरंगा लेकर चलना अपराध बन गया है?
लगभग एक सदी पहले अंग्रेज़ों ने राष्ट्रीय ध्वज के नीचे मार्च कर रहे भारतीयों को दबाने की कोशिश की थी। आखिरकार उन्हें समझना पड़ा कि दमन से आज़ादी की माँग को बुझाया नहीं जा सकता। तिरंगा उन लोगों का प्रतीक बन गया, जिन्होंने अपना देश वापस लेने का संकल्प लिया था। आज जब भारतीय अपनी ही सरकार को चुनौती देने के लिए वही झंडा लेकर निकलते हैं, तो सत्ता में बैठे लोगों को याद रखना चाहिए कि वह किसका प्रतिनिधित्व करता है। उसकी ताक़त जनता से आती है, और वह ताक़त आज भी कायम है।
आंदोलन से जुड़े सामने आ रहे विवरणों के अनुसार, जंतर मंतर पर तिरंगे के साथ पाँच दिन तक चले विरोध प्रदर्शन के बाद सीजेपी के तीन नेताओं को जेल भेज दिया गया है। यदि शांतिपूर्ण विरोध को ख़तरा माना जा रहा है, तो सरकार को अपनी कार्रवाई का जवाब देना होगा। दिल्ली के बीचोंबीच १६ अक्टूबर को एक बड़ी रैली का आह्वान किया गया है। ऐसे में आंदोलन को चुप कराने की कोशिशें उसके पीछे के आक्रोश को और गहरा कर सकती हैं।
भारतीय ज़िद्दी लोग हैं। सम्मान से बात कीजिए, तो वे किसी साझा उद्देश्य के लिए बड़े से बड़ा त्याग कर सकते हैं। उन्हें धमकाइए, अपमानित कीजिए या झुकाने की कोशिश कीजिए, तो उनका संकल्प और मजबूत हो सकता है। यह सबक अंग्रेज़ों ने आखिरकार तब सीखा, जब उन्होंने एक सुशिक्षित भारतीय, मोहनदास करमचंद गांधी, को वैध टिकट और उस डिब्बे में यात्रा करने का अधिकार होने के बावजूद ट्रेन से बाहर फेंककर अपमानित किया। आज लगता है कि भारत सरकार वह सबक भूल गई है।
हज़ारों वर्षों के इतिहास वाला यह राष्ट्र आक्रमणों, औपनिवेशिक शासन और बड़े-बड़े सामाजिक तथा राजनीतिक उथल-पुथल के दौर से गुज़रकर भी कायम रहा है। आज भारत के सामने चुनौती गंभीर है, लेकिन इसके लोगों ने इससे भी बड़ी चुनौतियों का सामना किया है। किसी सरकार को सत्ता पर अपनी अस्थायी पकड़ को राष्ट्र पर स्थायी मालिकाना हक़ नहीं समझ लेना चाहिए।
मेरी राय में मोदी को घेर रही आग काफी हद तक उन्हीं की लगाई हुई है। वादों ने उम्मीदें जगाईं, लेकिन प्रचार उन वादों और जनता के जीवन के बीच की दूरी को हमेशा नहीं छिपा सकता। जब छात्रों को अपना भविष्य ख़तरे में दिखाई दे, परिवार संघर्ष कर रहे हों और नागरिकों को लगे कि उनकी बात सुनी नहीं जा रही, तो केवल टेलीविज़न पर सब कुछ अच्छा बताए जाने से उनका गुस्सा ख़त्म नहीं हो जाता।
मोदी ने कभी देश से कहा था कि यदि वे बदलाव लाने में विफल रहे, तो जनता उन्हें जवाबदेह ठहराए। जनता को उस बात को याद रखने और शांतिपूर्ण, लोकतांत्रिक तरीकों से जवाब माँगने का पूरा अधिकार है। जवाबदेही का स्वागत केवल तब नहीं किया जा सकता, जब उससे तालियाँ मिलें, और आलोचना होने पर उसे ठुकरा दिया जाए।
आम लोगों के लिए काम करती सरकार देखने के बजाय मुझे ऐसी सरकार दिखाई देती है, जिस पर गंभीर आरोप हैं कि उसके फैसलों ने शक्तिशाली कारोबारी हितों को लाभ पहुँचाया है। उन आरोपों की स्वतंत्र जाँच होनी चाहिए। राष्ट्र की संपत्ति उसकी जनता की है, और किसी राजनीतिक नेता या कारोबारी सहयोगी को उसे अपनी निजी संपत्ति समझने का अधिकार नहीं है।
जिन वादों को “जुमले” कहकर टाल दिया जाता है, वे लोगों को यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि क्या उन्हें कभी पूरा करने का इरादा भी था। इस बीच, सरकार समर्थक मीडिया उसके दावों को दोहराता रहता है और अक्सर उन सवालों से बचता है, जिनका सामना इन दावों को करना चाहिए। लेकिन बार-बार दोहराने से झूठ सच नहीं बन जाता, और प्रचार किसी टूटे हुए वादे को मिटा नहीं देता।
मुझे सबसे अधिक हैरानी इस बात पर होती है कि अनेक राजनीतिक दावों की जाँच कितनी आसानी से की जा सकती है। कोई दस्तावेज़, आँकड़ों की तुलना, एक साधारण गणना या एक बटन दबाना भाषण और वास्तविकता के बीच का अंतर उजागर कर सकता है। जो लोग आँकड़े समझते हैं और सबूत परखते हैं, उनसे यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि जब भी कोई नेता मंच पर आए, वे अपनी समझ छोड़ दें।
मेरी नज़र में यह लड़ाई लगातार उन लोगों के बीच होती जा रही है, जो सबूत माँगते हैं, और उन नेताओं के बीच, जो बिना सवाल किए विश्वास की उम्मीद रखते हैं। यह सवाल पूछने की आदत और रटे-रटाए जवाब देने वाले तंत्र के बीच की लड़ाई है। विज्ञान हमें किसी दावे को परखना, उसकी जाँच करना और सबूत जो दिखाएँ उसे स्वीकार करना सिखाता है। राजनीतिक प्रचार हमसे पहले विश्वास करने और फिर सवाल पूछना बंद कर देने को कहता है।
कौन जीतेगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि भारतीय सवाल पूछते रहेंगे, दावों की जाँच करते रहेंगे और एकजुट खड़े रहेंगे या नहीं। सरकार के पास सत्ता का तंत्र हो सकता है, लेकिन जनता के हाथ में तिरंगा है। जो लोग समझते हैं कि वे इस झंडे को डराकर चुप करा सकते हैं, उन्हें इसके रंगों में समाया इतिहास याद रखना चाहिए।

Comments
Post a Comment