मोदी और शाह के हाथ से निकल रही है सत्ता: उलटी गिनती शुरू हो चुकी है

 

मोदी और शाह के हाथ से निकल रही है सत्ता: उलटी गिनती शुरू हो चुकी है

English Version: https://rakeshinsightfulgaze.blogspot.com/2026/10/modi-and-shah-are-losing-control-their.html
Video: https://www.instagram.com/reels/DeqB-PWvvRd/

जून से मैं मोदी और शाह पर बहुत बारीकी से नज़र रख रहा हूँ। गुजरात के ये दो घमंडी नेता आज अपनी ही बनाई मुसीबतों में बुरी तरह फँस चुके हैं। मेरी नज़र में पिछले 25 वर्षों से ये दोनों भारत को लूटते रहे हैं और अपने अमीर कारोबारी दोस्तों को और अमीर बनाते रहे हैं। ये जानते थे कि पैसे से सत्ता खरीदी जा सकती है और सत्ता से और पैसा कमाया जा सकता है। इसी सोच के साथ इन्होंने एक ऐसा फ़ॉर्मूला तैयार किया, जिसके सहारे ये सत्ता पर अपनी पकड़ बनाए हुए हैं।

इनका फ़ॉर्मूला बहुत सीधा था: उन ताकतवर लोगों को खरीद लो जिनके हाथों में जनता को नियंत्रित करने की ताकत है। कुछ राजनीति में हैं, कुछ पुलिस, न्यायपालिका और नौकरशाही में, जबकि कुछ केवल राजनीतिक गुंडे हैं। इन्होंने ताकतवर पदों पर बैठे लोगों की कमज़ोरियाँ पहचानीं और उनका इस्तेमाल करके उन्हें अपनी धुन पर नचाया। पैसा सब कुछ खरीद सकता है, यही इनका मूलमंत्र बन गया, जबकि आम भारतीयों के हितों को किनारे कर दिया गया।

लेकिन पैसे और सत्ता की इनकी भूख बढ़ती गई और नीट परीक्षा का पेपर लीक एक निर्णायक मोड़ बन गया। जिन छात्रों की मौत हुई, उनके परिवार राहुल गांधी की रैलियों में आए और पूरे देश को अपनी दर्दनाक कहानियाँ सुनाईं। मोदी और शाह के पापों का घड़ा अब भरकर छलकने लगा था। चुनाव चोरी के आरोपों और अपने समर्थक मीडिया के ज़रिए झूठ फैलाने से जनता का भरोसा पहले ही टूट रहा था। लेकिन ये दोनों यह नहीं समझ पाए कि इन छात्रों की मौत से युवाओं के भीतर पैदा हुआ गुस्सा एक ऐसा विकराल रूप ले सकता है, जिसे काबू करना इनके बस की बात नहीं रहेगी।

मैंने जो देखा है, उसके आधार पर मुझे लगता है कि मोदी घबराए हुए हैं, जबकि अमित शाह, अजीत डोभाल के साथ मिलकर इस आंदोलन को दबाने के रास्ते तलाश रहे हैं। लेकिन इनकी हरकतें हालात को और बिगाड़ रही हैं। शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के सामने पुलिस और राजनीतिक गुंडों को उतारना जनता के गुस्से को और बढ़ा रहा है। पुलिस भी समझती है कि बड़े टकराव से हिंसा भड़क सकती है और किसी राजनीतिक पार्टी को जनता के गुस्से से बचाने के लिए सेना के आने की उम्मीद नहीं की जा सकती। मेरा मानना है कि इसी वजह से पुलिस भी कुछ हद तक संयम बरत रही है।

छात्रों को गिरफ्तार करना और संदिग्ध कानूनों के सहारे अपने पक्ष में खड़े न्यायाधीशों से चेतावनियाँ दिलवाना भी अब उलटा पड़ रहा है। वकील इन कार्रवाइयों को चुनौती देने और प्रदर्शनकारियों के अधिकारों की रक्षा करने के लिए आगे आ रहे हैं। मोदी की नीतियों से परेशान छोटे कारोबारी भी शायद समझने लगे हैं कि इस सरकार का समर्थन करना अब उनके हित में नहीं है। यह आंदोलन छात्रों से आगे बढ़ रहा है और अधिक से अधिक लोग सरकार से सवाल पूछने लगे हैं।

अब मोदी के भाषण सुनिए। जनता के सवालों का जवाब देने के बजाय वे बार-बार कांग्रेस पर आरोप लगाते हैं कि वह उनकी सरकार गिराकर सत्ता हासिल करना चाहती है। राजनाथ सिंह ने तो अंग्रेज़ी का शब्द "रिजीम चेंज" यानी सत्ता परिवर्तन इस्तेमाल किया, जैसे अंग्रेज़ी में कह देने से उसका मतलब बदल जाता हो। बेशक कांग्रेस सत्ता में आना चाहती है। लोकतंत्र में विपक्षी दल यही तो करते हैं। फिर मोदी को सत्ता जाने का इतना डर क्यों है? जनता को जवाब देने के बजाय वे राहुल गांधी पर हमले क्यों कर रहे हैं?

राहुल गांधी लगातार कह रहे हैं कि मोदी सरकार की समाप्ति की तारीख नज़दीक आ रही है। शुरू में मुझे भी उनकी बात पर संदेह था, लेकिन इस आंदोलन को बढ़ते देखकर मेरी सोच बदल रही है। क्या आपने ध्यान दिया है कि अब मोदी के बचाव में कितने कम लोग सामने आ रहे हैं? जो लोग कभी उनके साथ मजबूती से खड़े रहते थे, वे भी अब काफी खामोश दिखाई दे रहे हैं।

अब बात आती है ज्ञानेश कुमार और सीमा खन्ना की। मेरा मानना है कि दोनों इस स्थिति से बुरी तरह डरे हुए होंगे। अगर वे मोदी के खिलाफ जाते हैं, तो उन्हें बदले की कार्रवाई का डर हो सकता है। लेकिन अगर वे मोदी के साथ बने रहते हैं और सरकार गिर जाती है, तो उन्हें जाँच और जेल जाने तक का सामना करना पड़ सकता है। राहुल उनकी स्थिति समझते दिखाई देते हैं और शायद इसीलिए उन पर ज़्यादा दबाव नहीं डाल रहे हैं। वे जानते हैं कि अगर नौकरशाही के पर्याप्त लोग सच बोलने लगें और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के सहयोगी अपना समर्थन वापस ले लें, तो सरकार गिर सकती है। तब ये लोग खुद को इतना सुरक्षित महसूस कर सकते हैं कि देश को वह सब बता सकें जो वे जानते हैं। उसी समय मोदी और शाह को भी अपने कर्मों के परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।

जब राहुल कहते हैं कि सरकार गिर रही है, तो अब मुझे समझ आने लगा है कि वे ऐसा क्यों कह रहे हैं। मेरे अवलोकन के अनुसार, यह अब केवल छात्रों का आंदोलन नहीं रहा। यह उन लोगों का आंदोलन बनता जा रहा है जो भ्रष्टाचार, डर और सत्ता के दुरुपयोग से तंग आ चुके हैं। अगर दिवाली के बाद भी लोग सड़कों पर उतरकर इस सरकार को हटाने की माँग करते रहे, तो मेरा मानना है कि मोदी और शाह के लिए इस दबाव को संभालना बेहद मुश्किल हो सकता है।

अगर मैं इंडिया गठबंधन और कॉकरोच पार्टी को सलाह दे रहा होता, तो उनसे कहता कि जहाँ भी भ्रष्टाचार, गैरकानूनी गिरफ्तारियों, चुनावी गड़बड़ियों या सत्ता के दुरुपयोग के सबूत हैं, वहाँ तुरंत प्राथमिकी दर्ज करवाना शुरू करें। पुलिस और न्यायपालिका की संदिग्ध कार्रवाइयों को चुनौती देने के लिए वकीलों को संगठित करें। फिर दिवाली के एक सप्ताह बाद पूरे भारत में विशाल शांतिपूर्ण रैलियाँ आयोजित करें, जिनका एक ही संदेश हो:

"आओ, मिलकर भारत को बेहतर बनाएँ।"

इस आंदोलन का उद्देश्य केवल मोदी और शाह को हटाना नहीं होना चाहिए। भारत को ऐसी सरकार चाहिए जो जनता को जवाब दे, ऐसी पुलिस चाहिए जो कानून का पालन करे, ऐसी न्यायपालिका चाहिए जो न्याय दे और ऐसा चुनाव आयोग चाहिए जो हर वोट की रक्षा करे।

पिछले 25 वर्षों से मोदी और शाह शायद यही समझते रहे कि पैसा, डर और ताकतवर लोगों से संबंध उन्हें हमेशा सत्ता में बनाए रखेंगे। लेकिन वे भूल गए कि जब जनता के मन से डर निकल जाता है, तो वह किसी भी सरकार से अधिक ताकतवर हो जाती है।

जून से मैं देख रहा हूँ कि डर अब जनता के मन से निकलकर सत्ता में बैठे लोगों के मन में पहुँच रहा है। अगर दिवाली के बाद भी यह आंदोलन इसी तरह बढ़ता रहा, तो मेरा मानना है कि मोदी और शाह को जल्द ही पता चल सकता है कि सत्ता में बने रहने का उनका पुराना फ़ॉर्मूला अब काम करना बंद कर चुका है।

Comments

Popular posts from this blog

How We Turned an Abstract God into Concrete Hate

Distraction as Governance: How a Scripted National Song Debate Shielded the SIR Controversy

Superstitions: Where Do They Come From, and Why Do People Believe in Them?