दशहरा: जब सत्ता में बैठे लोग अपने ही पुतले जलने से डरने लगें
दशहरा: जब सत्ता में बैठे लोग अपने ही पुतले जलने से डरने लगें
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आज भारत ने दशहरा मनाया, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। इस दिन रामायण के पौराणिक पात्र रावण का पुतला जलाया जाता है, जिसने भगवान राम की पत्नी सीता का अपहरण किया था। करोड़ों सनातन धर्म के अनुयायी राम को भगवान मानकर उनकी पूजा करते हैं। दुख की बात यह है कि रामलीला मैदान में भाजपा के आयोजकों ने कथित तौर पर कॉकरोच का पुतला जलाया, जो छात्रों को न्याय दिलाने के लिए संघर्ष कर रहे एक छात्र संगठन का प्रतीक बन चुका है। न्याय की माँग करने वाले आंदोलन के प्रतीक को जलाना दशहरे की भावना के बिल्कुल खिलाफ है। ये छात्र देश के खिलाफ नहीं, बल्कि उन लोगों के खिलाफ लड़ रहे हैं जिन्होंने उनका भविष्य बर्बाद किया है।
मैंने सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो भी देखे हैं जिनमें मोदी, शाह, ज्ञानेश कुमार, योगी आदित्यनाथ और कुछ अन्य लोगों के चेहरों वाले पुतले जलाए जा रहे हैं। इन लोगों पर अन्याय करने और सत्ता का दुरुपयोग करने के आरोप हैं। इन पुतलों को जलाना उन लोगों के खिलाफ एक राजनीतिक विरोध है जिन पर गलत काम करने के आरोप हैं। कोई भी जनता से हथियार उठाकर इन लोगों की हत्या करने के लिए नहीं कह रहा है। लोकतंत्र में जनता को शांतिपूर्ण तरीके से प्रतीकात्मक विरोध के माध्यम से अपना गुस्सा व्यक्त करने का अधिकार है। अगर भाजपा के आयोजक छात्रों के प्रतीक का पुतला जला सकते हैं, तो जनता को राजनीतिक नेताओं के पुतले जलाने का वही अधिकार क्यों नहीं होना चाहिए?
इस सरकार का अहंकार अब उस हद तक पहुँचता दिखाई दे रहा है जहाँ किसी राजनीतिक सभा से उठकर चले जाना भी अपराध माना जाने लगा है। खबरों के अनुसार, बनारस में आयोजित एक सभा में अमित शाह का भाषण सुनने के लिए बहुत कम लोग पहुँचे थे। जब लगभग 25 लोगों ने वहाँ से जाने का फैसला किया, तो पुलिस ने कथित तौर पर उन्हें लाठीचार्ज करने और एफआईआर दर्ज करने की धमकी दी। कब से किसी राजनीतिक नेता का भाषण सुनना अनिवार्य हो गया? लोगों को जबरदस्ती ऐसे व्यक्ति का भाषण सुनने के लिए क्यों बैठाया जाए, जिसने खुद लोगों के बैंक खातों में 15 लाख रुपये जमा करने के भाजपा के वादे को समझाते हुए 'जुमला' शब्द का इस्तेमाल किया था? शायद सरकार को लोगों को जबरदस्ती बैठाए रखने के बजाय यह सोचना चाहिए कि जनता का उसके वादों से भरोसा क्यों उठ गया है।
भारत की राजनीतिक स्थिति हर दिन बिगड़ती दिखाई दे रही है, और विपक्ष अब इस सरकार को किसी भी मामले में छूट देने के मूड में नहीं है। मुझे एक खबर यह भी मिली कि दिल्ली पुलिस के प्रमुख ने राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे से संपर्क करके कहा कि पुलिस अब थक चुकी है और सरकार के खिलाफ चल रहे आंदोलन को धीमा करने में उनकी मदद चाहती है। मैं इस खबर की पुष्टि नहीं कर सकता, लेकिन अगर ऐसा हुआ है तो मुझे कोई हैरानी नहीं होगी। आखिर पुलिस के जवान कब तक अपने ही देशवासियों के खिलाफ खड़े रहेंगे, जो शांतिपूर्ण तरीके से न्याय की माँग कर रहे हैं? उनका कर्तव्य जनता की रक्षा करना और कानून लागू करना है, न कि सत्ता में बैठे नेताओं के राजनीतिक हितों की सेवा करना।
दिल्ली में महिला पत्रकारों के साथ जो कथित तौर पर हुआ, वह इससे भी ज्यादा परेशान करने वाला है। मैंने एक वीडियो देखा जिसमें ये महिलाएँ राहुल गांधी को बता रही थीं कि दिल्ली पुलिस के अधिकारियों ने उन्हें कैसे पीटा, उनके कपड़े फाड़े और उनके साथ बदसलूकी की। मैंने राहुल गांधी को कांग्रेस नेताओं को निर्देश देते हुए भी देखा कि वे जयपुर, राजस्थान में एफआईआर दर्ज करवाएँ, क्योंकि ये महिलाएँ मूल रूप से राजस्थान की रहने वाली थीं और दिल्ली पुलिस ने कथित तौर पर अपने ही अधिकारियों के खिलाफ शिकायत दर्ज करने से इनकार कर दिया था। भारतीय कानून के अनुसार, किसी भी पुलिस थाने में जीरो एफआईआर दर्ज करवाई जा सकती है, चाहे अपराध कहीं भी हुआ हो। इसके बाद उसे जाँच के लिए संबंधित क्षेत्र के पुलिस थाने में भेजा जा सकता है। मैंने कांग्रेस नेताओं के वे वीडियो भी देखे जिनमें वे पत्रकारों को जयपुर में एफआईआर दर्ज करवाने के अपने प्रयासों के बारे में बता रहे थे। उनके अनुसार, उन्हें कमरा नंबर 9 में 18 घंटे से अधिक समय तक बैठाए रखा गया, जबकि एसीपी ऊपर से आदेश आने का इंतजार करता रहा। महिलाओं के साथ मारपीट करने के आरोपी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के लिए किसी पुलिस अधिकारी को ऊपर से अनुमति लेने की जरूरत क्यों पड़ती है? आखिर इन फैसलों को नियंत्रित कौन कर रहा है? पुलिस अधिकारियों को अधिकार संविधान और कानून से मिलते हैं, मोदी, शाह या किसी राजनीतिक नेता से नहीं। अगर उन्हें अपना कानूनी कर्तव्य निभाने के लिए राजनीतिक अनुमति का इंतजार करना पड़े, तो फिर लोकतंत्र बचा ही कहाँ है?
एक और गंभीर मामला मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण, यानी एसआईआर, से जुड़ा है। मुझे ऐसे दावों की जानकारी मिली कि एसआईआर की अनुमति से संबंधित दस्तावेज माँगने के लिए दायर एक आरटीआई से कथित तौर पर पता चला कि भारत के चुनाव आयोग ने कभी एसआईआर की माँग ही नहीं की थी। अगर यह सच है, तो इसे मंजूरी किसने दी? मुझे इंडियन एक्सप्रेस से जुड़ी एक रिपोर्ट का भी ध्यान है, जिसमें वरिष्ठ आईटी अधिकारी सीमा खन्ना का नाम आया था और आरोप लगाया गया था कि गृह मंत्री के अनुरोध पर एक सॉफ्टवेयर को मंजूरी दी गई थी। इन दावों की वास्तविक दस्तावेजों के आधार पर जाँच होनी चाहिए। अगर चुनाव आयोग ने इस प्रक्रिया को मंजूरी नहीं दी थी, तो किसने दी और करोड़ों भारतीयों के मतदान के अधिकार के साथ आखिर क्या हुआ? सरकार और चुनाव आयोग को संबंधित दस्तावेज जनता के सामने रखने चाहिए और इन सवालों का जवाब देना चाहिए।
मुझे नहीं पता कि अगले कुछ दिनों में क्या होने वाला है, लेकिन मेरा विश्वास लगातार बढ़ता जा रहा है कि भारत में एक बड़ा राजनीतिक बदलाव आने वाला है, और मोदी को भी इसका एहसास जरूर होगा। राहुल गांधी चेतावनी दे चुके हैं कि गैरकानूनी गतिविधियों में शामिल अधिकारियों को सरकार बदलने के बाद कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है। संभव है कि इस चेतावनी के कारण कुछ अधिकारी अब अपने कदम सोच-समझकर उठा रहे हों, क्योंकि वे जानते हैं कि राजनीतिक संरक्षण हमेशा नहीं रहेगा और उन्हें जाँच, जेल, नौकरी तथा पेंशन से जुड़े परिणामों का सामना करना पड़ सकता है।
मुझे यह जानकारी भी मिली है कि श्रीमती खन्ना अब दिल्ली के बजाय देहरादून में हैं, जबकि कुछ समाचार चैनल दावा कर रहे हैं कि उन्होंने इस्तीफा दे दिया है। मैं इन खबरों की पुष्टि नहीं कर सकता, लेकिन अगर ये सच हैं, तो जनता को यह जानने का अधिकार है कि उन्होंने पद क्यों छोड़ा और क्या उनके जाने का एसआईआर से जुड़े आरोपों से कोई संबंध है। इस्तीफा किसी जाँच का विकल्प नहीं हो सकता।
मोदी और शाह शायद अब भी मानते हैं कि वे पुलिस के दबाव, राजनीतिक ताकत और डर के सहारे देश को नियंत्रित कर सकते हैं। लेकिन जब जनता सत्ता में बैठे लोगों से डरना छोड़ देती है, तो हालात बदलने लगते हैं। रावण शक्तिशाली था, धनवान था और उसके चारों तरफ ऐसे लोग थे जो उसके आदेशों का पालन करते थे। फिर भी उसकी ताकत उसे अपने कर्मों के परिणामों से नहीं बचा सकी। यही दशहरे का संदेश है, और यह उन सभी लोगों पर लागू होता है जो भारत के सबसे ऊँचे पदों पर बैठे हैं।
कॉकरोच का पुतला जलाने से छात्रों का आंदोलन खत्म नहीं होगा। एफआईआर की धमकी देने से जनता का भरोसा वापस नहीं आएगा। पुलिस अधिकारियों के खिलाफ शिकायत दर्ज होने से रोकने पर अन्याय मिट नहीं जाएगा। चुनावों से जुड़े सवालों का जवाब देने से इनकार करने पर जनता यह नहीं मान लेगी कि सब कुछ सही चल रहा है।
इस दशहरे पर असली सवाल यह नहीं है कि कितने पुतले जलाए गए, बल्कि यह है कि जो लोग बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न मनाते हैं, क्या वे उस समय भी अन्याय के खिलाफ खड़े होने की हिम्मत रखते हैं, जब अन्याय उनकी अपनी सरकार की तरफ से हो रहा हो?
मेरा मानना है कि इस सरकार के पैरों के नीचे की राजनीतिक जमीन बदल रही है, और इसकी सत्ता की समाप्ति की तारीख शायद मोदी और शाह की सोच से कहीं ज्यादा तेजी से करीब आ रही है।
देखते रहिए।

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