मोदी और शाह: सत्ता और पुलिस के पीछे छिपे दो कायर

 

मोदी और शाह: सत्ता और पुलिस के पीछे छिपे दो कायर


Watch the Video: https://youtu.be/D0GZd37kQ9I

English Version: https://rakeshinsightfulgaze.blogspot.com/2026/10/modi-and-shah-two-cowards-hiding-behind.html

क्या आपने कभी ऐसे दो नेता देखे हैं, जो खुद को भारत के सबसे ताकतवर इंसान बताते हैं, लेकिन अपनी ही जनता का सामना करने से डरे हुए दिखाई देते हैं? नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने भारतीय लोकतंत्र को एक ऐसी व्यवस्था में बदल दिया है, जहाँ संविधान से ज्यादा महत्व पैसे, राजनीतिक प्रभाव और पुलिस की ताकत का दिखाई देता है। ये अपनी लोकप्रियता का ढोल पीटते हैं, जबकि वोट चोरी और चुनावों में हेराफेरी के गंभीर आरोपों के जवाब आज भी नहीं मिले हैं।

तीन साल पहले अमित शाह ने वादा किया था कि वह मणिपुर में तीन दिन रहकर वहाँ शांति स्थापित करेंगे। लेकिन लगता है कि वे तीन दिन इतिहास में कहीं खो गए। भारी सुरक्षा वाले मंच से शाह शेर की तरह दहाड़ सकते हैं, लेकिन जब जनता जवाब माँगती है, तो वह बिल ढूँढ़ते चूहे की तरह व्यवहार करते हैं। यह कैसा गृहमंत्री है, जिसे उन्हीं नागरिकों से इतनी सुरक्षा चाहिए, जिनकी रक्षा करना उसकी जिम्मेदारी है?

शाह साहब, क्या आप भारत की जनता को मूर्ख समझते हैं? लोग देख सकते हैं कि विपक्ष की रैलियों में कितनी भारी भीड़ उमड़ती है, जबकि भाजपा के नेता वैसा उत्साह पैदा करने के लिए संघर्ष करते दिखाई देते हैं। केवल रैलियों की भीड़ से चुनाव के नतीजे साबित नहीं होते, लेकिन मतदाताओं के नाम हटाए जाने और वोट चोरी के आरोपों का जवाब देना जरूरी है। विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) का आदेश किसने दिया? मतदाता सूचियों से इतने नाम क्यों हटाए गए? अगर ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग के पास छिपाने के लिए कुछ नहीं है, तो सारे रिकॉर्ड सार्वजनिक करके स्वतंत्र जाँच का सामना क्यों नहीं करते?

अब अंकिता भंडारी हत्याकांड को देखिए। तीन लोगों को दोषी ठहराया जा चुका है, लेकिन एक राजनीतिक रूप से प्रभावशाली व्यक्ति से जुड़े आरोप आज भी अनसुलझे हैं। हर विश्वसनीय सबूत की जाँच सुनिश्चित करने के बजाय अधिकारियों ने ऐसे हालात पैदा होने दिए हैं, जिनसे राजनीतिक संरक्षण का संदेह और गहरा होता जा रहा है। इस मामले से संबंधित रिकॉर्डिंग होने का दावा करने वाली एक महिला को दूसरे मामले में गिरफ्तार कर लिया गया है। उसके आरोप अभी साबित नहीं हुए हैं, लेकिन उसके पास मौजूद कथित सबूतों की स्वतंत्र जाँच क्यों नहीं होनी चाहिए? क्या राजनीतिक प्रतिष्ठा बचाना एक बेरहमी से मारी गई युवती को न्याय दिलाने से ज्यादा जरूरी है?

और मोदी और शाह ने भारत की पुलिस का क्या हाल कर दिया है? शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वालों को गिरफ्तार किया जाता है, हिरासत में रखा जाता है और रिहाई से पहले उनसे मुचलके पर हस्ताक्षर करवाए जाते हैं कि वे शांति भंग नहीं करेंगे। दूसरी तरफ, प्रदर्शनकारियों को धमकाने या उन पर हमला करने के आरोप झेलने वालों के खिलाफ वैसी सख्ती दिखाई नहीं देती। क्या पुलिस अब नेताओं की निजी सुरक्षा सेवा बनकर रह गई है? संविधान ने पुलिस को नागरिकों की रक्षा करने का अधिकार दिया है, सरकार से सवाल पूछने पर उन्हें डराने-धमकाने का नहीं।

मोदी और शाह ने राजनीतिक सत्ता को भारत की जागीर समझ लिया है। इन्हें लगता है कि संस्थाओं पर नियंत्रण करके, अपने चारों ओर सुरक्षा का घेरा बनाकर और आलोचकों पर हमला करके ये हमेशा सत्ता में बने रहेंगे। लेकिन लोकतंत्र दो नेताओं, उनके अमीर समर्थकों या मुट्ठी भर राजनीतिक गुंडों की जागीर नहीं है।

एक मजबूत नेता पुलिस की बैरिकेडिंग के पीछे नहीं छिपता। एक मजबूत नेता संसद का सामना करता है, सवालों के जवाब देता है, स्वतंत्र जाँच का स्वागत करता है और जनता के संवैधानिक अधिकारों का सम्मान करता है। मेरी नजर में मोदी और शाह इस कसौटी पर पूरी तरह विफल रहे हैं। इनकी राजनीति ने चुनाव आयोग, पुलिस और लोकतंत्र की रक्षा करने वाली संस्थाओं पर जनता के भरोसे को कमजोर किया है।

मोदी साहब और शाह साहब, यह नाटक बंद कीजिए कि सवाल पूछना कोई अपराध है। अरे कायरों, भगवान के लिए उन सवालों का जवाब तो दो! चुनावों में हेराफेरी के आरोपों का जवाब दीजिए। शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के साथ हो रहे व्यवहार का हिसाब दीजिए। अंकिता भंडारी हत्याकांड से जुड़े हर विश्वसनीय आरोप की स्वतंत्र जाँच सुनिश्चित कीजिए। भारत की जनता को अपनी प्रजा समझना बंद कीजिए।

भारत ने अंग्रेजी हुकूमत को इसलिए हराया था, क्योंकि यहाँ के लोगों ने अपनी आजादी के सामने घुटने टेकने से इनकार कर दिया था। वही जनता अपने लोकतांत्रिक अधिकारों पर खतरा मंडराते देखकर हमेशा खामोश नहीं बैठी रहेगी।

मोदी और शाह सरकार पर नियंत्रण रख सकते हैं, लेकिन भारत इनके बाप की जागीर नहीं है। और पुलिस की कितनी भी सुरक्षा क्यों न हो, कोई भी नेता जनता के फैसले से खुद को नहीं बचा सकता।

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