गाय की राजनीति: धर्म, विदेशी प्रभाव और वोटों का कारोबार
गाय की राजनीति: धर्म, विदेशी प्रभाव और वोटों का कारोबार
भारत
की आज़ादी के 79 वर्षों बाद भी अंग्रेज़ों
की फूट डालो और
राज करो की नीति
भारतीय राजनीति को प्रभावित करती
आ रही है। अंग्रेज़
अच्छी तरह जानते थे
कि भारत को उसकी
धार्मिक और जातिगत विभिन्नताओं
का फ़ायदा उठाकर कमज़ोर किया जा सकता
है। आरएसएस और मुस्लिम लीग
जैसे संगठन ब्रिटिश शासन के दौरान
अस्तित्व में आए, और
इन संगठनों को बाहरी शक्तियों
से मिलने वाले आर्थिक और
राजनीतिक समर्थन को लेकर आज
भी सवाल उठते हैं।
मेरा हमेशा से मानना रहा
है कि अंग्रेज़ों के
भारत छोड़ने के साथ विदेशी
हस्तक्षेप समाप्त नहीं हुआ। आज़ादी
से पहले और उसके
बाद भी विदेशी हितों
के माध्यम से धार्मिक और
राजनीतिक संगठनों तक धन पहुँचने
के आरोप लगते रहे
हैं। पश्चिमी सरकारें इसमें सीधे तौर पर
कितनी शामिल थीं, यह साबित
करना कठिन है, लेकिन
दूसरे देशों की राजनीति में
पश्चिमी ख़ुफ़िया एजेंसियों के हस्तक्षेप का
इतिहास किसी से छिपा
नहीं है। मेरे विचार
में भारत को विभाजित
रखना उन शक्तियों के
हित में था, जो
एक मज़बूत और स्वतंत्र भारत
नहीं देखना चाहती थीं। आरएसएस ने
समाज की ऐसी व्यवस्था
का समर्थन किया, जो पुरानी धार्मिक
और सामाजिक ऊँच-नीच से
प्रभावित थी। मेरे विचार
में ऐसी व्यवस्था गांधी
और नेहरू के आधुनिक लोकतांत्रिक
भारत की कल्पना की
तुलना में शक्तिशाली वर्गों
के हितों के अधिक अनुकूल
थी।
1948 में महात्मा
गांधी की हत्या ने
धार्मिक कट्टरता के ख़तरों को
उजागर कर दिया। सरदार
वल्लभभाई पटेल ने आरएसएस
पर प्रतिबंध लगा दिया था,
हालाँकि सरकार को कुछ आश्वासन
दिए जाने के बाद
1949 में यह प्रतिबंध हटा
लिया गया। गांधी ने
धार्मिक सद्भाव के लिए संघर्ष
किया था, लेकिन उनकी
हत्या के बाद भी
धार्मिक विभाजन की राजनीति जारी
रही। भारत कभी भी
एक धर्म, एक भाषा, एक
जाति या एक संस्कृति
का देश नहीं रहा।
यह विभिन्न समाजों और संस्कृतियों का
संगम था, जो मिलकर
एक राष्ट्र बने। दुर्भाग्य से
राजनीतिक नेताओं ने धार्मिक विभिन्नताओं
को लोगों को बाँटने और
सत्ता हासिल करने का साधन
बना लिया। और गाय उनके
सबसे शक्तिशाली राजनीतिक हथियारों में से एक
बन गई।
गोरक्षा
आंदोलन आज़ादी से बहुत पहले
शुरू हो चुके थे।
1860 के दशक में पंजाब
के नामधारी सिख गोरक्षा से
जुड़े आंदोलनों में सक्रिय थे,
जबकि 1880 के दशक में
आर्य समाज ने संगठित
गोरक्षा अभियानों का विस्तार किया।
1893 तक गोहत्या को लेकर हुए
विवादों ने बड़े पैमाने
पर सांप्रदायिक हिंसा को जन्म दिया।
इंदिरा गांधी की सरकार के
दौरान यह मुद्दा विशेष
रूप से विस्फोटक बन
गया। 7 नवंबर 1966 को हज़ारों साधु,
धार्मिक कार्यकर्ता और समर्थक देशभर
में गोहत्या पर प्रतिबंध लगाने
की माँग को लेकर
संसद के बाहर एकत्र
हुए। आरएसएस, भारतीय जनसंघ और हिंदू महासभा
जैसे संगठनों ने इस आंदोलन
का समर्थन किया। प्रदर्शन हिंसक हो गया, पुलिस
ने गोलियाँ चलाईं और कई लोगों
की जान चली गई।
श्रीमती गांधी के शासनकाल में
गोरक्षा एक भावनात्मक राजनीतिक
मुद्दा बना रहा। धार्मिक
संगठन गोहत्या पर प्रतिबंध लगाने
की माँग करते रहे,
जबकि सरकार को धार्मिक दबाव,
संवैधानिक ज़िम्मेदारियों, कृषि और पशुपालन
तथा मांस उद्योग से
जुड़े आर्थिक हितों के बीच संतुलन
बनाना पड़ रहा था।
फिर
आया 1971 का वर्ष। श्रीमती
गांधी के नेतृत्व में
भारत ने पाकिस्तान को
पराजित किया और बांग्लादेश
के निर्माण में निर्णायक भूमिका
निभाई। अमेरिका के दबाव के
बावजूद भारत ने अपनी
सैन्य और राजनीतिक शक्ति
का प्रदर्शन किया। इंदिरा गांधी दुनिया के सबसे शक्तिशाली
नेताओं में से एक
बनकर उभरीं। मेरा मानना है
कि भारत की बढ़ती
शक्ति ने उसके आंतरिक
विभाजनों को उन लोगों
के लिए और भी
उपयोगी बना दिया, जो
भारत को कमज़ोर देखना
चाहते थे। विदेशी आर्थिक
हितों ने विशेष धार्मिक
आंदोलनों को सीधे समर्थन
दिया था या नहीं,
इसे स्थापित करना कठिन है,
लेकिन भारत को विभाजित
रखने के राजनीतिक फ़ायदे
स्पष्ट दिखाई देते हैं।
अब
गायों को लेकर किए
जाने वाले पाखंड पर
नज़र डालिए। बुद्ध और महावीर के
प्रभाव से पहले भारतीय
उपमहाद्वीप के विभिन्न समाजों
में खानपान की अलग-अलग
परंपराएँ थीं, जिनमें मांसाहार
भी शामिल था। भारत कभी
पूरी तरह शाकाहारी देश
नहीं रहा, और आज
भी अलग-अलग क्षेत्रों
तथा समुदायों की भोजन संबंधी
परंपराएँ अलग हैं। फिर
भी कुछ धार्मिक संगठन
ऐसा व्यवहार करते हैं, मानो
गोमांस खाना दुनिया का
सबसे बड़ा अपराध हो।
लेकिन इंसान गायों के साथ वास्तव
में कैसा व्यवहार करता
है? हम गायों को
बाँधकर रखते हैं, उनका
दूध निकालते हैं और कई
बार उनके बछड़ों को
अपनी माँ का दूध
पीने से भी रोकते
हैं। जब गायें पर्याप्त
दूध देना बंद कर
देती हैं, तो उनमें
से बहुत-सी गायों
को बेसहारा छोड़ दिया जाता
है। कुछ सड़कों पर
भटकती रहती हैं और
कूड़ा-कचरा तथा प्लास्टिक
खाकर अपना पेट भरती
हैं। आख़िर इसमें दया और करुणा
कहाँ है? अगर गाय
पवित्र है, तो उसे
दूध पैदा करने वाली
व्यावसायिक मशीन की तरह
क्यों इस्तेमाल किया जाता है?
उसके बछड़े क्यों कष्ट सहते हैं,
जबकि इंसान उनका दूध पीता
है? इतनी सारी बेसहारा
गायों की देखभाल क्यों
नहीं होती? गोरक्षा के नाम पर
नारे लगाने वाले यही लोग
डेयरी उद्योग में पशुओं के
साथ होने वाले व्यवहार
पर शायद ही कभी
सवाल उठाते हैं।
और
फिर शुरू होता है
राजनीति का कारोबार। भाजपा
ने बार-बार गोरक्षा
का इस्तेमाल धार्मिक भावनाओं को भड़काने और
राजनीतिक समर्थन हासिल करने के लिए
किया है, जबकि मांस
प्रसंस्करण और निर्यात से
जुड़ी कंपनियों द्वारा राजनीतिक चंदा दिए जाने
को लेकर विवाद भी
सामने आए हैं। भारत
आज भी भैंस के
मांस का एक बड़ा
निर्यातक है, जो क़ानूनी
रूप से गाय के
मांस से अलग है।
अगर मांस उद्योग इतना
ही आपत्तिजनक है, तो राजनीतिक
दलों को उससे जुड़ी
कंपनियों का पैसा स्वीकार
क्यों करना चाहिए? यही
वह पाखंड है जिसे लोगों
को समझने की ज़रूरत है।
धर्म एक कारोबार बन
जाता है, गाय एक
राजनीतिक प्रतीक बन जाती है
और आम भारतीयों को
इस बात पर लड़ने
के लिए उकसाया जाता
है कि उनका पड़ोसी
क्या खाता है। इस
बीच राजनेता वोट बटोरते रहते
हैं।
भारत
को अब तक आर्थिक
और वैज्ञानिक दृष्टि से कहीं अधिक
शक्तिशाली राष्ट्र बन जाना चाहिए
था। लेकिन लगातार आने वाली सरकारें
जातिगत विभाजनों को दूर करने
और छोटे व्यवसायों, वैज्ञानिक
अनुसंधान तथा विकास में
पर्याप्त निवेश करने में विफल
रहीं। धार्मिक विवादों ने बार-बार
लोगों का ध्यान उन
मुद्दों से भटकाया, जो
उनके जीवन को बेहतर
बना सकते थे। गाय
वोट नहीं दे सकती,
लेकिन राजनेताओं ने यह खोज
लिया है कि उसके
नाम पर लाखों वोट
बटोरे जा सकते हैं।
मेरे प्यारे दोस्तों, उन राजनेताओं और
धार्मिक संगठनों के बहकावे में
मत आइए, जो गायों
से प्रेम करने का दावा
तो करते हैं, लेकिन
उनकी पीड़ा को अनदेखा कर
देते हैं। अगर उन्हें
सचमुच गायों की चिंता है,
तो उनके लिए उचित
भोजन, आश्रय, पशु चिकित्सा और
क्रूरता से सुरक्षा की
व्यवस्था करें। लोगों को उनके खानपान
के कारण धमकाने के
बजाय डेयरी उद्योग में पशुओं के
व्यावसायिक शोषण पर सवाल
उठाएँ।
अंग्रेज़
अच्छी तरह समझते थे
कि धार्मिक विभाजन भारत को कैसे
कमज़ोर कर सकता है।
दुर्भाग्य से आज़ादी के
इतने वर्षों बाद भी अनेक
राजनेता उसी रणनीति का
इस्तेमाल करते आ रहे
हैं। गाय को राजनीतिक
शोषण नहीं, दया और करुणा
चाहिए। भारत को एक
और सदी तक फूट
डालो और राज करो
की राजनीति नहीं, बल्कि प्रगति चाहिए। और उन लोगों
से, जो लगातार गोरक्षा
के नाम पर नारे
लगाते रहते हैं, मेरा
केवल एक सवाल है:
आप गाय की रक्षा
कर रहे हैं या
उस राजनीतिक कारोबार की, जो आपने
गाय के नाम पर
खड़ा कर रखा है?

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