मोदी और शाह के छिपने के ठिकाने खत्म होते जा रहे हैं: राहुल की चुनौती सब कुछ उजागर कर सकती है
मोदी और शाह के छिपने के ठिकाने खत्म होते जा रहे हैं: राहुल की चुनौती सब कुछ उजागर कर सकती है
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English Version: https://rakeshinsightfulgaze.blogspot.com/2026/11/modi-and-shah-are-running-out-of-places.html
पिछले
कुछ महीनों में हमने दुनिया
भर में बड़े राजनीतिक
बदलाव देखे हैं। ब्राज़ील
वामपंथ की ओर बढ़ा
है, इज़राइल में नेतन्याहू मुश्किल
में हैं और अमेरिका
में ट्रंप को बड़ा झटका
लगा है, जहाँ डेमोक्रेट्स
ने प्रतिनिधि सभा और सीनेट,
दोनों पर नियंत्रण हासिल
कर लिया है। इस
बीच भारत में मोदी
की हालत ऐसी दिखाई
दे रही है जैसे
वे काँटों पर बैठे हों।
इन नेताओं में एक बात
समान है: ये सभी
दक्षिणपंथी नेता हैं, जिन्होंने
सत्ता हासिल करने और उस
पर बने रहने के
लिए राष्ट्रवाद का इस्तेमाल किया
है। लेकिन एक बड़ा अंतर
है। अमेरिका, ब्राज़ील और इज़राइल में
चुनावी व्यवस्थाओं ने सत्ता में
बैठे नेताओं को चुनौती देने
का अवसर दिया है।
भारत में मेरा मानना
है कि मोदी और
शाह लोकतंत्र की रक्षा करने
वाली संस्थाओं को अपने प्रभाव
में लाने में कहीं
अधिक आगे निकल गए
हैं।
लगभग
एक साल से भारत
के विपक्षी दल मतदाता सूचियों
से नाम हटाए जाने,
चुनावी अनियमितताओं और चुनाव आयोग
के कामकाज को लेकर लगातार
आवाज़ उठा रहे हैं।
फिर भी कोई संस्था
ऐसी दिखाई नहीं देती जो
ज़िम्मेदार लोगों को जवाबदेह ठहरा
सके। मेरी नज़र में
मोदी और शाह को
इतना भरोसा हो गया था
कि उन्होंने मीडिया, नौकरशाही और जाँच एजेंसियों
सहित पूरे सिस्टम पर
नियंत्रण कर लिया है
कि उन्होंने कभी सोचा भी
नहीं होगा कि उनके
कथित अपराध साबित होने पर वे
पकड़े जा सकते हैं,
उन पर मुकदमा चल
सकता है या उन्हें
जेल भी जाना पड़
सकता है। न्यायपालिका को
लेकर भी गंभीर सवाल
उठते हैं। अमेरिका में
संघीय अदालतों में नियुक्त न्यायाधीशों
को सीनेट की मंज़ूरी लेनी
पड़ती है। भारत में
उच्च न्यायपालिका की नियुक्तियों के
लिए कॉलेजियम व्यवस्था है, लेकिन इससे
राजनीतिक और वैचारिक प्रभाव
की आशंकाएँ समाप्त नहीं हो जातीं।
मेरा मानना है कि न्यायपालिका
की स्वतंत्रता की गंभीरता से
जाँच होनी चाहिए।
मैंने
भारत के कई वरिष्ठ
नौकरशाहों से बात की
है, जो बताते हैं
कि वहाँ की व्यवस्था
कितनी जटिल है और
अधिकारियों से किस तरह
निर्वाचित सरकारों के आदेशों का
पालन करने की अपेक्षा
की जाती है। लेकिन
उनकी ज़िम्मेदारी संविधान के प्रति है,
मोदी, शाह या किसी
राजनीतिक दल के प्रति
नहीं। जब नौकरशाह गलत
आदेशों पर सवाल उठाना
बंद कर देते हैं
और केवल वही करने
लगते हैं जो राजनेता
चाहते हैं, तो पूरा
सिस्टम सत्ता में बैठे लोगों
के हाथों का औज़ार बन
जाता है। इसी तरह
चुनाव होते रहने के
बावजूद लोकतंत्र कमज़ोर होता चला जाता
है।
भाजपा
ने राष्ट्रवाद को नफ़रत फैलाने
का हथियार भी बना दिया
है, यहाँ तक कि
विदेशों में रहने वाले
भारतीयों के खिलाफ भी।
केवल मोदी की आलोचना
करने के कारण कभी-कभी प्रवासी भारतीयों
पर आरोप लगाया जाता
है कि उन्हें भारत
की कोई परवाह नहीं
है। यह उन लाखों
भारतीयों का कितना बड़ा
अपमान है जिन्होंने भारत
की आज़ादी की लड़ाई में
योगदान दिया, देश के हाई-टेक उद्योग को
खड़ा करने में मदद
की, भारत में ज्ञान
और व्यवसाय लेकर आए और
भारतीय अर्थव्यवस्था में भारी निवेश
किया। मेरी राय में
भाजपा ने अपने राजनीतिक
एजेंडे को धर्म में
लपेट दिया है और
विवादास्पद धर्मगुरुओं का इस्तेमाल लोगों
को प्रभावित करने के लिए
किया है। कुछ दोषी
ठहराए गए धार्मिक नेताओं
को जेल से अस्थायी
रिहाई भी मिली है,
जिससे राजनीतिक प्रभाव को लेकर सवाल
उठते हैं। धर्म अपराधियों
की रक्षा करने का साधन
नहीं बनना चाहिए और
मोदी की आलोचना करने
से कोई देशद्रोही नहीं
हो जाता।
राहुल
गांधी ने अब आपराधिक
तत्वों और सत्ता में
बैठे लोगों के बीच कथित
संबंधों को लेकर गंभीर
आरोप लगाए हैं, जिनमें
अमित शाह, संगठित अपराध
और सिद्धू मूसेवाला की हत्या से
जुड़े सवाल भी शामिल
हैं। ये आरोप अदालत
में साबित नहीं हुए हैं,
लेकिन इतने गंभीर हैं
कि इनकी स्वतंत्र जाँच
होनी चाहिए। राहुल का कहना है
कि आपराधिक गिरोहों और राजनीतिक सत्ता
के बीच खतरनाक संबंध
बन गए हैं। यदि
सबूत इन आरोपों की
पुष्टि करते हैं, तो
ज़िम्मेदार लोगों को कानून का
सामना करना चाहिए, चाहे
वे कितने भी शक्तिशाली क्यों
न हों।
अब
बात आती है राहुल
की मोदी को खुली
बहस की चुनौती की।
मोदी ने विपक्ष पर
देशविरोधी होने और विदेशी
ताक़तों से समर्थन लेने
के आरोप लगाए हैं।
राहुल ने उन्हें चुनौती
दी है कि वे
सामने आएँ, अपने सबूत
पेश करें और अपनी
सरकार के कामों तथा
विदेशी संबंधों पर उठ रहे
सवालों के जवाब दें।
मोदी के चुनौती स्वीकार
करने के बजाय भाजपा
समर्थक कथित तौर पर
कह रहे हैं कि
मोदी केवल अपने स्तर
के लोगों से बहस करते
हैं। इससे बेहूदा बहाना
और क्या हो सकता
है! अगर शिक्षा ही
बहस का स्तर तय
करती है, तो शायद
कांग्रेस को अपने किसी
सबसे कम उम्र के
ऐसे सदस्य को ढूँढ़ना चाहिए
जिसने केवल पाँचवीं कक्षा
तक पढ़ाई की हो, ताकि
वह मोदी से बहस
कर सके। शायद तब
भाजपा शिकायत करना बंद कर
दे!
लेकिन
असली सवाल यह है
कि क्या मोदी बिना
लिखे हुए भाषण, बिना
टेलीप्रॉम्प्टर और बिना किसी
दोस्ताना गोदी मीडिया एंकर
के राहुल का सामना कर
सकते हैं? राहुल का
कहना है कि वे
विदेशी प्रभाव, सरकारी फ़ैसलों और कथित गलत
कामों से जुड़े सबूत
लेकर तैयार हैं। यदि ये
सबूत विश्वसनीय हैं, तो इनकी
जाँच होनी चाहिए। कोई
बहस मोदी को जेल
नहीं भेज सकती, लेकिन
वह ऐसे मामले उजागर
कर सकती है जिनसे
गंभीर कानूनी सवाल खड़े हो
सकते हैं। शायद यही
बात उन्हें परेशान कर रही है।
चुनिंदा दर्शकों के सामने भाषण
देना आसान है। राष्ट्रीय
टेलीविज़न पर राहुल का
सामना करना और उनके
सवालों के जवाब देना
बिल्कुल अलग बात है।
वर्षों
से मोदी खुद को
एक निडर नेता के
रूप में पेश करते
रहे हैं। लेकिन जब
राहुल उन्हें चुनौती देते हैं, तो
भाजपा के प्रवक्ता बहाने
लेकर सामने आते हैं और
मोदी ख़ामोश रहते हैं। अगर
राहुल गलत हैं, तो
मोदी सामने आकर उन्हें गलत
साबित करें। अगर मोदी के
पास छिपाने के लिए कुछ
नहीं है, तो उन्हें
पूरे देश के सामने
अपना पक्ष रखने के
इस अवसर का स्वागत
करना चाहिए। खुद को इतना
मज़बूत नेता बताने वाले
प्रधानमंत्री के लिए इससे
आसान और क्या हो
सकता है?
दुनिया
भर में हो रहे
राजनीतिक बदलाव मोदी और शाह
को याद दिलाने चाहिए
कि कोई भी हमेशा
सत्ता में नहीं रहता।
चुनावों, भ्रष्टाचार, आपराधिक प्रभाव और भारत की
संस्थाओं की स्वतंत्रता से
जुड़े आरोपों को भाषणों और
व्यक्तिगत हमलों से खारिज नहीं
किया जा सकता। इनके
लिए जवाब, सबूत और जवाबदेही
चाहिए।
मोदी
जी, राहुल गांधी आपका इंतज़ार कर
रहे हैं। पूरा देश
आपका इंतज़ार कर रहा है।
आपने विपक्ष पर देशविरोधी होने
का आरोप लगाया और
राहुल ने आपको इसे
साबित करने की चुनौती
दी है। राहुल कह
रहे हैं कि वे
अपने सबूत लेकर आएँगे।
अब आप भी अपने
सबूत लेकर आइए। भाजपा
प्रवक्ताओं को बहाने बनाने
के लिए आगे भेजना
बंद कीजिए। बाहर आइए, उस
खाली कुर्सी पर बैठिए, राहुल
का सामना कीजिए और उनके सवालों
के जवाब दीजिए।
अगर
आपके पास छिपाने के
लिए कुछ नहीं है,
तो आखिर डर किस
बात का है?

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