स्लॉट मशीन सिंड्रोम: कैसे भारतीय कुछ पलों की खुशी में अपने दुख-दर्द भूल जाते हैं
स्लॉट मशीन सिंड्रोम: कैसे भारतीय कुछ पलों की खुशी में अपने दुख-दर्द भूल जाते हैं
मैं अक्सर सोचता हूँ कि आखिर भारत के लोगों को एकजुट रखने वाली चीज़ क्या है? कैसे करोड़ों लोग अमीरों और विशेषाधिकार प्राप्त लोगों के हाथों बेरहमी से शोषित होने के बावजूद शांत रहते हैं और अपनी ज़िंदगी में आगे बढ़ जाते हैं? पश्चिमी देशों में हम अक्सर देखते हैं कि लोग अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाने के लिए अधिक तैयार रहते हैं, लेकिन भारतीय समाज ने जैसे दुख और शोषण सहने की एक असाधारण क्षमता विकसित कर ली है। मैं इसे स्लॉट मशीन सिंड्रोम कहता हूँ।
जिस किसी ने स्लॉट मशीन पर जुआ खेला है, वह जानता है कि यह कैसे काम करती है। आप मशीन में लगातार पैसे डालते रहते हैं, बार-बार हारते हैं, लेकिन उम्मीद करते हैं कि अगली बार शायद जीत मिल जाए। फिर सैकड़ों डॉलर हारने के बाद अचानक थोड़ी-सी रकम जीत जाते हैं और चेहरे पर खुशी आ जाती है। उस एक पल में आप अपनी सारी हार भूल जाते हैं। वह छोटी-सी जीत आपको फिर से खेलने की उम्मीद दे देती है, जबकि मशीन लगातार आपसे ज़्यादा ले रही होती है और वापस बहुत कम देती है।
मुझे भारतीय समाज में भी कुछ ऐसा ही दिखाई देता है। दिवाली के दिन करोड़ों भारतीय एक दिन के लिए अपने दुख-दर्द भूल जाते हैं और राम की वापसी का उत्सव मनाते हैं। राम एक प्राचीन महाकाव्य में वर्णित पात्र हैं, जिन्हें करोड़ों लोग भगवान मानकर पूजते हैं। जिन लोगों के पास जीवन की बुनियादी ज़रूरतें पूरी करने के लिए भी पर्याप्त पैसा नहीं होता, वे भी किसी तरह मिठाइयाँ खरीदते हैं, दीये जलाते हैं और अपने बच्चों के चेहरों पर मुस्कान लाने की कोशिश करते हैं। एक दिन के लिए गरीबी, बेरोज़गारी, महँगाई और अन्याय पीछे छूट जाते हैं। लोग अपने पास मौजूद थोड़े-से साधनों से खुशी मनाते हैं और उस पल की खुशी में अपनी तकलीफ़ें भूल जाते हैं।
इतने कम साधनों के बावजूद लोगों का खुशी ढूँढ़ लेना अपने आप में एक खूबसूरत बात है। लेकिन मुझे परेशान यह बात करती है कि सदियों से धर्म और सामाजिक परंपराओं के नाम पर लोगों की मानसिकता को इस तरह ढाला गया है कि वे शोषण सहने के इतने आदी हो गए हैं कि अक्सर उस असली रावण को पहचान ही नहीं पाते, जो पीढ़ियों से उन्हें लूटता आ रहा है।
पश्चिमी देशों में भी थैंक्सगिविंग और क्रिसमस जैसे त्योहार मनाए जाते हैं, लेकिन वहाँ कंपनियाँ ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए ज़रूरत की चीज़ों के दाम घटाने की होड़ लगाती हैं। उनका मकसद भी पैसा कमाना होता है, लेकिन इस प्रतिस्पर्धा का कुछ फायदा ग्राहकों को मिल जाता है। भारत में मुझे एक ऐसा समाज दिखाई देता है जहाँ गरीबों से अक्सर उम्मीद की जाती है कि अमीर, विशेषाधिकार प्राप्त लोग या सरकार उन्हें जो थोड़ा-बहुत दे दें, उसी के लिए वे एहसानमंद रहें।
यहीं से स्लॉट मशीन सिंड्रोम खतरनाक बन जाता है। एक परिवार पूरे साल खाने, शिक्षा, इलाज और मकान के खर्चों से जूझता रहता है। फिर कोई त्योहार आता है, सरकार से थोड़ी-सी सहायता मिल जाती है या कोई अमीर व्यक्ति छोटा-सा उपहार दे देता है, और अचानक खुशी छा जाती है। ठीक उस जुआरी की तरह, जो सैकड़ों डॉलर हारने के बाद कुछ डॉलर जीतकर अपनी सारी हार भूल जाता है, लोग भी थोड़ा-सा वापस मिलने पर भूल जाते हैं कि उनसे कितना कुछ छीना जा चुका है।
मेरा मानना है कि भाजपा द्वारा मनुस्मृति और उससे जुड़ी सामाजिक ऊँच-नीच की व्यवस्था को बढ़ावा देने के पीछे भी यही सोच काम करती है। जब समाज का एक बड़ा हिस्सा गरीब और अमीरों तथा विशेषाधिकार प्राप्त लोगों पर निर्भर रहता है, तो छोटे-छोटे उपहार भी उसके भीतर कृतज्ञता और वफ़ादारी पैदा कर सकते हैं। ऐसे लोगों को यह समझाना आसान हो जाता है कि अपने से ऊपर बैठे लोगों की सेवा करना उनका कर्तव्य है और समाज में अपनी स्थिति स्वीकार करना उनकी परंपरा का हिस्सा है। जिन्हें इस व्यवस्था से फायदा मिलता है, वे भला इसे बदलना क्यों चाहेंगे?
हर साल भारतीय अच्छाई की बुराई पर जीत का उत्सव मनाने के लिए रावण का पुतला जलाते हैं। लेकिन मेरी नज़र में असली रावण वे लोग हैं जो गरीबों का शोषण करते हैं, धन और सत्ता अपने हाथों में जमा करते हैं और धर्म तथा परंपराओं का इस्तेमाल करके आम लोगों को अन्याय के खिलाफ सवाल उठाने से रोकते हैं। हम प्रतीकात्मक रावण को जला देते हैं, लेकिन असली शोषण को जारी रहने देते हैं।
मैं दिवाली से मिलने वाली खुशी पर सवाल नहीं उठा रहा हूँ और न ही लोगों की धार्मिक आस्थाओं या त्योहार मनाने के अधिकार पर। मेरा सवाल यह है कि जो समाज त्योहार मनाने के लिए इतनी खूबसूरती से एकजुट हो सकता है, वही समाज शिक्षा, समानता, अवसर और न्याय की माँग करने के लिए उसी दृढ़ता से एकजुट क्यों नहीं हो सकता?
भारत की त्रासदी यह नहीं है कि उसके लोग छोटी-छोटी चीज़ों में खुशी ढूँढ़ लेते हैं। असली त्रासदी यह है कि सत्ता और धन पर कब्ज़ा जमाए लोगों ने इन छोटी-छोटी खुशियों का इस्तेमाल करना सीख लिया है, ताकि जनता भूल जाए कि उससे कितना कुछ छीना जा चुका है।
स्लॉट मशीन पर खेलने वाले जुआरी की तरह लोग उम्मीद लगाए रहते हैं कि अगली बाज़ी शायद उनकी ज़िंदगी बदल देगी। लेकिन जब तक वे यह सवाल नहीं पूछेंगे कि मशीन किसके नियंत्रण में है और उसमें डाला गया पैसा किसकी जेब में जा रहा है, तब तक उनकी हार जारी रहेगी।
रावण पर असली विजय उस दिन होगी, जब भारतीय जीवन भर के दुख और शोषण के बदले मिलने वाले छोटे-छोटे इनामों से संतुष्ट होना छोड़ देंगे और अपना वह अधिकार माँगना शुरू करेंगे, जो वास्तव में उनका है।

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